भारत में वस्तु एवं
सेवा कर (जीएसटी)
जीएसटी के संबंध में एक व्यापक निर्देशिका
 
1.0 भारत में कर व्यवस्था - एक प्रवेशिका | 1.1 जीएसटी संख्याएं एवं तथ्य | 1.2 भारतीय वैट व्यवस्था की समस्याएं | 1.3 जीएसटी किस प्रकार से कार्य करेगा? | 1.3.1 राज्य के भीतर दोहरा जीएसटी | 1.3.2 वस्तुओं और सेवाओं के अंतर राज्य लेनदेन के लिए जीएसटी | 1.4 क्या जीएसटी एक व्यवस्था परिवर्तक है? | 2.0 जीएसटी की न्यायिक और संवैधानिक यात्रा | 2.1 वर्ष 2011, 2014 और 2016 के विधेयकों और संशोधनों की तुलना | 3.0 जीएसटी तंत्र का एक सरल स्पष्टीकरण | 4.0 वे मुख्य मुद्दे जो नागरिकों को प्रभावित करेंगे | 5.0 भारत - एक बाजार | 6.0 जीएसटी के क्षेत्रवार लाभ | 7.0 जीएसटी के समग्र लाभ | 7.1 जीएसटी के लाभों के विषय में सरकार का मूल्यांकन | 7.2 जीएसटी का चित्रात्मक प्रदर्शन | 8.0 जीएसटी की तकनीकी बारीकियां | 8.1 भारतीय जीएसटी व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं | 9.0 किसे लाभ होगा - निगमों को या नागरिकों को? | 10.0 जीएसटी, धोखाधडी में कमी, पारदर्शिता और आधार  | 11.0 क्या जीएसटी अतिरंजित है? | 12.0 जीएसटी को वास्तविकता बनाने के लिए सरकार द्वारा जीएसटीएन में उठाए गए प्रशासनिक कदम | 13.0 अंतिम सारांश | 14.0 अतिरिक्त तकनीकी जानकारी | 14.1 संविधान (122 वें संशोधन) विधेयक, 2014 की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? | 14.2 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित पंजीकरण प्रक्रिया की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? | 14.3 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित विवरण प्रस्तुति प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? | 14.4 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित भुगतान प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? | 15.0 एक फिसलन भरी राह

1.0 भारत में कर व्यवस्था - एक प्रवेशिका

हम भारत के प्राचीन पांडित्य के संदर्भ से शुरू करते हैं।

"राजा को उचित समय पर अपनी प्रजा से संपत्ति प्राप्त करनी चाहिए। अपनी गाय का नित्य दोहन करने वाले एक बुद्धिमान व्यक्ति के समान राजा को अपने राज्य का प्रतिदिन दोहन करना चाहिए। जैसे मधुमक्खी धीरे-धीरे फूलों से मधु (शहद) इकठ्ठा करती है, उसी प्रकार राजा को भी संग्रह करने के लिए अपने राज्य से धीरे-धीरे संपत्ति का संग्रहण करना चाहिए।"
-भीष्म सुशासन पर युधिष्ठिर को सलाह दे रहे हैं, महाभारत, शांति पर्व (पुस्तक 12), राजधर्म अनुशासन पर्व (अध्याय 88)

प्रत्येक सरकार अपनी प्रजा पर कर अधिरोपित करती है। दुर्भाग्य से समय के साथ भारत में यह व्यवस्था अत्यंत जटिल और विकृत हो गई है। वस्तु एवं सेवा कर प्राचीन गौरव और पांडित्य को पुनः प्राप्त करने का एक प्रयास है।

कर सरकार द्वारा किसी उत्पाद, आय या गतिविधि पर प्रभारित किया जाने वाला शुल्क होता है। यदि यह किसी व्यक्ति या कंपनी की आय पर अधिरोपित किया जाता है तो यह प्रत्यक्ष कर बन जाता है। हालांकि, यदि कर किसी वस्तु या सेवा के मूल्य पर अधिरोपित किया जाता है तो यह अप्रत्यक्ष कर बन जाता है।

सरकारें कर क्यों लगाती हैं? शासन के कार्य जारी रखने के लिए आवश्यक राजस्व का अर्जन करने के लिए अर्थात, स्वयं के व्ययों का वित्तीयन करने के लिए। बडी संख्या में करों का उपयोग अंततः सार्वजनिक सेवाओं के संचालन के लिए किया जाता है जो देश के नागरिकों के लिए हितकारी और लाभदायक होती हैं।

विक्रय कर - किये गए प्रत्येक विक्रय पर अधिरोपित किये गए कर को विक्रय कर कहा जाता है। इस प्रकार, कोई व्यापारी ए किसी दूसरे व्यापारी बी को माल की बिक्री करते समय बी से स्थानीय विक्रय कर संग्रहित करता जो आमतौर पर वस्तु के मूल्य में ही शामिल होता है। आगे बी भी सी के साथ इसी प्रक्रिया को दोहराता है। इस प्रकार कर बार-बार अधिरोपित होता रहता है क्योंकि बी के विक्रय मूल्य में उसका ए से किया हुआ क्रय मूल्य भी शामिल है (जिसमें विक्रय कर शामिल था) और उसका लाभ शामिल है।

करों का सोपानी या प्रपाती प्रभाव निम्न चित्र में दर्शाया गया है।

मूल्य संवर्धित कर (वैट) इन्वेंटरी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण पर लगाया गया कर। प्रक्रिया के प्रतेयक चरण पर - विनिर्माता से वितरक तक और थोक विक्रेता से खुदरा विक्रेता तक और अंततः ग्राहक तक - कर अधिरोपित किया जाता है। वैट एकसमान होता है।

सेवा कर (एसटी) - सेवाओं पर अधिरोपित किया गया कर

उत्पादन शुल्क और वैट - वस्तुओं पर अधिरोपित कर

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) - वस्तुओं और सेवाओं, दोनों पर अधिरोपित किया गया मूल्य संवर्धित कर (वैट) । एक व्यापक कर जो अन्य सभी करों को सम्मिलित करता है। भारत में यहाँ तक कि वैट भी करों के प्रपाती प्रभाव को समाप्त करने में सक्षम नहीं था, अतः वस्तु एवं सेवा कर।

(भारत में जीएसटी मूलभूत सीमा शुल्क को छोडकर उपरोक्त सभी करों को सम्मिलित कर सकेगा, सीमा शुल्क जीएसटी लागू होने के बाद भी अधिरोपित किया जाना जारी रहेगा। मुद्रांक शुल्क इत्यादि जैसे अन्य अप्रत्यक्ष कर भी जारी रहेंगे। भारत एक दोहरे जीएसटी मॉडल का अवलंब करेगा, जिसका अर्थ है कि जीएसटी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों, दोनों द्वारा प्रशासित किया जाएगा)

भारत सरकार  द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति (अगस्त 2016) वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को निम्न प्रकार से परिभाषित करती है :

"जीएसटी संपूर्ण देश के लिए एक अप्रत्यक्ष कर है, जो भारत को एक एकीकृत समान बाजार बना देगा। जीएसटी वस्तुओं और सेवाओं पर अधिरोपित होने वाला एकल कर है, जो विनिर्माताओं से लेकर उपभोक्ता तक सभी पर लागू है। प्रक्रिया के प्रत्येक चरण पर भुगतान किये गए निविष्टि करों के श्रेय मूल्य संवर्धन के अगले चरण पर उपलब्ध होंगे, जो जीएसटी को मूल्य संवर्धन के प्रत्येक चरण पर अनिवार्य रूप से एक अधिरोपित होने वाला कर बनाता है। इस प्रकार अंतिम उपभोक्ता केवल मूल्य श्रृंखला के अंतिम चरण पर अंतिम विर्तक द्वारा लगाए गए जीएसटी को ही वहन करेगा, जिसमें प्रत्येक पिछले चरण पर व्यतिरेक (मुआवजे) का लाभ उपलब्ध होगा"।

जीएसटी के घटक - भारत एक दोहरी जीएसटी व्यवस्था का अवलंब करने जा रहा है। यहाँ एक केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) और राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) होगा। वस्तुओं के अंतर-राज्य लेनदेन के लिए एक तीसरा घटक भी प्रस्तावित है - आईजीएसटी या एकीकृत जीएसटी। इसकी कार्य प्रणाली आगे समझाई गई है।

सीजीएसटी - सीजीएसटी वर्तमान में अधिरोपित अनेक करों को समाहित करेगा जैसे (ए) केंद्रीय उत्पादन शुल्क, (बी) अतिरिक्त उत्पादन शुल्क, (सी) सेवा कर, (डी) अतिरिक्त सीमा शुल्क जिसे आमतौर पर प्रतिकारी शुल्क (सीवीडी) कहा जाता है, (ई) विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क (एडीसी), (एफ) अधिभार एवं उपकर

एसजीएसटी - एसजीएसटी वर्तमान में अधिरोपित अनेक करों को समाहित करेगा जैसे (ए) राज्य मूल्य संवर्धित कर (वैट) और विक्रय कर, (बी) चुंगी (नगर शुल्क) और प्रवेश कर, (सी) क्रय कर, (डी) मनोरंजन कर, (ई) विलासिता कर, (सीवीडी), (एफ) लॉटरी कर, (जी) राज्य अधिभार एवं उपकर [केंद्र और राज्य, दोनों मूल्य श्रृंखला पर एकसाथ जीएसटी अधिरोपित करेंगे। वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रत्येक आपूर्ति पर कर अधिरोपित किया जाएगा। केंद्र केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) अधिरोपित करेगा और इसका संग्रहण करेगा, जबकि राज्य राज्य  भीतर होने वाले प्रत्येक लेनदेन पर राज्य वस्तु एवं सेवा कर (एसजीएसटी) अधिरोपित करेंगे और इसका संग्रहण करेंगे। सीजीएसटी पर निविष्टि कर के श्रेय उत्पादन के प्रत्येक चरण पर सीजीएसटी की देयता का वहन करने के फलस्वरूप उपलब्ध होंगे। उसी प्रकार, निविष्टियों पर भुगतान किये गए एसजीएसटी के श्रेय उत्पादन पर एसजीएसटी के भुगतान पर उपलब्ध होंगे।]

श्रेयों के पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) की अनुमति नहीं होगी।

दिया गया चित्र भारत की वर्तमान अप्रत्यक्ष कर संरचना (केंद्रीय एवं राज्य) को प्रदर्शित करता है। सीवीडी = प्रतिकारी शुल्क, एसएडी = विशेष अतिरिक्त शुल्क (वास्तव में निराशाजनक!)

1.1 जीएसटी संख्याएं एवं तथ्य

  • जीएसटी के आने के साथ ही, निम्न देशों के जीडीपी में वृध्दि देखी गई - कनाडा में 1.4 प्रतिशत की, न्यूजीलैंड में 2 प्रतिशत की और ऑस्ट्रेलिया में 1 प्रतिशत की। भारत के लिए ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है कि यह वृद्धि 0.9 प्रतिशत से 1.7 प्रतिशत के बीच होगी।
  • भारत में 12 प्रतिशत से 20 प्रतिशत के बीच जीएसटी दर प्रस्तावित है। अन्य देशों में यह निम्नानुसार है - कनाडा 5 प्रतिशत, यूके 20 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया 10 प्रतिशत, फ्रांस 19 प्रतिशत, न्यूजीलैंड 15 प्रतिशत और चीन 17 प्रतिशत।
  • जीएसटी को शुरू करने से भारत को प्रति वर्ष लगभग 80,000 करोड रुपये की बचत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। रोजगार वृद्धि लगभग 40 लाख से 50 लाख के बीच रहने की संभावना है। विनिर्मित उत्पादों पर मूल्य में लगभग 2.5 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

1.2 भारतीय वैट व्यवस्था की समस्याएं

भारत में ऐसी वैट व्यवस्था शुरू की गई थी जिसमें प्रत्येक अगले चरण में व्यापारी को उसकी कर देयता पर पिछले चरणों के दौरान भुगतान किये गए करों पर श्रेय प्राप्त होना था। लाभ? व्यापारियों की समग्र देयता में कमी, मूल्यों पर मुद्रास्फीति के प्रभाव में कमी। पूर्व में केंद्रीय उत्पादन शुल्क में इसी प्रकार की परिकल्पना थी - सीईएनवैट श्रेय योजना (जिसे पूर्व में मॉडवैट कहा जाता था) । इसमें निविष्टि चरण पर भुगतान किये गए उत्पादन शुल्क पर वस्तुओं के निकास पर उत्पादन शुल्क देयता के साथ श्रेय के व्यतिरेक की अनुमति थी। वर्ष 2004 में इस व्यवस्था का विस्तार सेवा कर पर भी किया गया। उत्पादन शुल्क और सेवा कर के बीच श्रेय के पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) की भी अनुमति थी। इन उपायों के कारण करों के प्रपाती प्रभाव की समस्या का समाधान हो गया।

परन्तु वर्ष 2016 तक भी व्यवस्था में कुछ ऐसी समस्याएं थीं जिनका समाधान नहीं हो पाया था।

  • निविष्टि वैट का श्रेय उत्पादन वैट के विरुद्ध उपलब्ध है और निविष्टि उत्पादन शुल्क / सेवा कर का श्रेय उत्पादन शुल्क / सेवा कर की उत्पादन देयता के विरुद्ध उपलब्ध है। हालांकि वैट का श्रेय उत्पादन शुल्क के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है, और न ही उत्पादन शुल्क का श्रेय वैट के विरुद्ध उपलब्ध है। [यहाँ यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वैट की गणना उस मूल्य पर होती है जिसमें उत्पादन शुल्क शामिल है, और इसके लिए सेनवैट के श्रेय की अनुमति नहीं है, अतः यह कर पर कर अधिरोपित करने का का उदाहरण है]
  • उत्पादन शुल्क और सेवा कर केंद्र सरकार द्वारा अधिरोपित किये जाते हैं, जबकि वैट राज्य सरकार द्वारा अधिरोपित किया जाता है। इसके कारण श्रेयों का पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) असंभव हो गया। हालांकि करों का प्रपाती प्रभाव जारी रहा ! एक भुगतान किया जाने वाला कर एक भुगतान किया जाने वाला कर ही बना रहता है !

1.3 जीएसटी किस प्रकार से कार्य करेगा?

मंत्रिमंडल ने (27 जुलाई 2016 को) जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक में परिवर्तनों को मंजूरी प्रदान की, जिसमें 1 प्रतिशत विनिर्माण कर के प्रस्ताव को वापस लिया गया और राज्यों को यह आश्वासन प्रदान किया गया कि  इस प्रस्तावित अप्रत्यक्ष कर शासन की शुरुआत के बाद पांच वर्षों तक उन्हें होने वाली राजस्व हानि की क्षतिपूर्ति प्रदान की जाएगी। संविधान संशोधन विधेयक में यह भी शामिल करने का निर्णय लिया गया कि केंद्र और राज्यों के बीच किसी भी विवाद का निर्णय जीएसटी परिषद् द्वारा किया जाएगा जिसमें केंद्र और राज्यों, दोनों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इस प्रकार, भारत में एसजीएसटी - राज्य जीएसटी - हॉग जिसका संग्रहण राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा, और सीजीएसटी - केंद्रीय जीएसटी होगा जिसका संग्रहण केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। इस प्रकार, जीएसटी का प्रशासन जीएसटी परिषद् का उत्तरदायित्व होगा, जो जीएसटी के लिए शीर्ष नीति निर्माण निकाय होगा।

जीएसटी वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति के प्रत्येक लेनदेन पर एकसाथ अधिरोपित किया जाएगा जिसमें उन छूट प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं को छूट प्रदान की जाएगी जो जीएसटी की परिधि से बाहर हैं और साथ ही ऐसे लेनदेनों पर छूट प्राप्त होगी जो निर्धारित प्रारंभिक सीमा से नीचे हैं। साथ ही, राज्य वैट के विपरीत, जो वस्तुओं के केंद्रीय उत्पादन शुल्क सहित मूल्य पर अधिरोपित किया जाता है, ये दोनों कर (सीजीएसटी और एसजीएसटी) एक ही कीमत या मूल्य पर अधिरोपित किये जाएंगे।

1.3.1 राज्य के भीतर दोहरा जीएसटी

राज्य के भीतर दोहरे जीएसटी मॉडल की कार्य प्रणाली का चित्रात्मक प्रदर्शन नीचे की आकृति में दर्शाया गया है।

उपरोक्त चित्र में वस्तुओं और सेवाओं के बीच सीजीएसटी के श्रेयों के पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) की अनुमति होगी। उसी प्रकार, एसजीएसटी के मामले में भी श्रेयों के पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) की अनुमति होगी। हालांकि आईजीएसटी मॉडल के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं की अंतर राज्य आपूर्ति को छोडकर अन्य मामलों में सीजीएसटी और एसजीएसटी के पार उपयोग (क्रॉस यूटिलाइजेशन) की अनुमति नहीं होगी। आईजीएसटी मॉडल के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं की अंतर राज्य आपूर्ति  को अगले प्रश्न के उत्तर में समझाया गया है।

1.3.2 वस्तुओं और सेवाओं के अंतर राज्य लेनदेन के लिए जीएसटी

आईजीएसटी पद्धति की दृष्टि से जीएसटी के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं के अंतर राज्य लेनदेन पर कर किस प्रकार अधिरोपित किया जाएगा? अंतर राज्य लेनदेनों के मामले में केंद्र संविधान के अनुच्छेद 269 ए (1) के तहत वस्तुओं और सेवाओं की समस्त अंतर राज्य आपूर्तियों पर एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर अधिरोपित करेगा और उसका संग्रहण करेगा। आईजीएसटी सीजीएसटी और एसजीएसटी के लगभग बराबर होगा। आईजीएसटी तंत्र की संरचना एक राज्य से दूसरे राज्य में निविष्टि कर के सुचारू प्रवाह को सुनिश्चित करने की दृष्टि से की गई है। अंतर राज्य विक्रेता अपनी वस्तुओं के विक्रय पर केंद्र सरकार को आईजीएसटी का भुगतान करेगा जिस दौरान वह अपनी खरीद पर आईजीएसटी, सीजीएसटी और एसजीएसटी (इसी क्रम में) के श्रेयों को समायोजित करेगा। निर्यात करने वाला राज्य आईजीएसटी के भुगतान में उपयोग किया गया श्रेय केंद्र को हस्तांतरित करेगा। आयात करने वाला व्यापारी अपने स्वयं के राज्य में  अपनी उत्पादन देयता कर (सीजीएसटी और एसजीएसटी दोनों) की पूर्ति करते समय आईजीएसटी के श्रेयों का दावा करेगा। केंद्र एसजीएसटी के भुगतान में उपयोग किये गए आईजीएसटी के श्रेय आयातक राज्य को हस्तांतरित करेगा। चूंकि जीएसटी एक गंतव्य आधारित कर है, अतः अंतिम उत्पाद पर समस्त एसजीएसटी आमतौर पर उपभोक्ता राज्य को प्राप्त होंगे।

अंतर राज्य लेनदेनों के लिए आईजीएसटी मॉडल की कार्य प्रणाली का चित्रात्मक प्रदर्शन नीचे की आकृति में दर्शाया गया है।

1.4 क्या जीएसटी एक व्यवस्था परिवर्तक है?

अनेक लोगों का दावा है कि जीएसटी शासन एक व्यवस्था परिवर्तक साबित होगा। उन्हें ऐसा क्यों लगता है? तर्क दिया जाता है कि जीएसटी एक समान भारतीय बाजार के विकास में सहायक होगा और यह वस्तुओं और सेवाओं की लागत पर कर के प्रपाती प्रभाव (कर पर कर पर कर) को कम करेगा। यह व्यवस्था वर्तमान कर संरचना के अनेक पहलुओं की प्रत्यक्ष तौर पर पुनर्रचना करेगी - कर संरचनाएं, कर भर, कर गणना, कर भुगतान, कर अनुपालन, श्रेय का दावा और उपयोग और कर प्रतिवेदन - जिसके कारण भारतीय कर प्रणाली की एक नई आकृति निर्मित होगी।

यह व्यापार व्यवसायों को किस प्रकार से प्रभावित करेगा? यह वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करेगा, यह आपूर्ति श्रृंखलाओं, सूचना प्रौद्योगिकी उपकरणों और ईआरपी, लेखा मानदंडों इत्यादि  के इष्टतमीकरण में परिणामित होगा। कंपनियों के लिए सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों का अवलंबन आवश्यक होगा, उन्हें प्रक्रियाओं में परिवर्तनों के लिए तैयार होना होगा उन्हें अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना होगा और साथ ही उन्हें जीएसटी  अनुरूप सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र विकसित करने होंगे।

वस्तु एवं सेवा कर विधेयक का लक्ष्य एक नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के माध्यम से सभी राज्यों को एक एकल बाजार में परिवर्तित करने का है, जिसमें उत्पादन शुल्क, विक्रय कर और सेवा कर जैसे उद्ग्रहणों का समावेशन हो जाएगा। यह राज्यों की सीमाओं पर मिलान की आवश्यकता को कम करेगा और संभवतः यह देश को देश भर में फैले जांच चौकियों के जाल को तोडने में सहायक होगा, जिसके परिणामस्वरूप वस्तुओं का परिवहन अधिक गतिमान हो जाएगा। जीएसटी उपभोग कर के समान ही एक गंतव्य कर है। यह वस्तुओं और सेवाओं पर तब अनुप्रयुक्त होता है जब उपभोक्ता उन्हें क्रय करता है। वर्तमान में 160 से अधिक विकसित देशों में यह व्यवस्था लागू है।
 
गंतव्य सिद्धांत क्या है? जीएसटी संरचना गंतव्य सिद्धांत का पालन करेगी। तदनुसार, आयात जीएसटी के दायरे में होंगे, जबकि निर्यात शून्य क्रमित होंगे। भारत के भीतर अंतर राज्य लेनदेनों के मामले में राज्य कर मूल राज्य के बजाय गंतव्य राज्य में अनुप्रयुक्त होंगे।

अतः जीएसटी संघीय संरचना में विभिन्न सरकारों द्वारा अधिरोपित किये जाने वाले भ्रमित करने वाले भिन्न-भिन्न करों को एक एकल राष्ट्रव्यापी कर से प्रतिस्थापित करेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी की इस अत्यंत लंबी यात्रा को समाप्त करने के उद्देश्य से आम राय बनाने के लिए सभी राजनीतिक दलों तक पहुँचने का प्रयास करने का निश्चय किया था। जबकि हमें 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी और इस प्रकार हम एक एकल राजनीतिक निकाय - एक राज्य बने, वहीं अब अंततः हम एक विखंडित बहुविध बाजारों के समूह के स्थान पर एक एकल बाजार बन जाएंगे। हम अपने स्वयं के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर रहे हैं !

यहाँ विश्व की स्थिति पर दृष्टिक्षेप प्रदान किया गया है। इस लेख के अंत में एक विस्तृत तालिका भी दी गई है।

2.0 जीएसटी की न्यायिक और संवैधानिक यात्रा

केंद्र सरकार एक ऐसी व्यवस्था बनाने के प्रति प्रतिबद्ध रही है जो केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर अधिरोपित किये जाने वाले सभी अप्रत्यक्ष करों को प्रतिस्थापित करेगी। उसकी मंशा वर्ष 2016 तक जीएसटी लागू करने की थी। जीएसटी के साथ यह अनुमान लगाया गया है कि कर आधार अधिक विस्तारित और गहरा हो जाएगा, और अधिकांश वस्तुएं और सेवाएं कर पात्र हो जाएंगी।

जीएसटी की इस यात्रा का कदम-दर- कदम इतिवृत्त नीचे दिया गया है।

  1. राजकोषीय शक्तियों का पृथक्करण: जीएसटी को लागू करने के लिए एक संविधान संशोधन आवश्यक होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि संविधान की सातवीं अनुसूची में कराधान के संदर्भ में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन का प्रावधान किया गया है। अंतर राज्य वस्तु विक्रय के अतिरिक्त वर्त्तमान में केंद्र वस्तु विक्रय पर कर नहीं लगा सकता है। इसी प्रकार, राज्य किसी भी प्रकार का सेवा कर अधिरोपित नहीं कर सकते हैं। सातवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुच्छेद 246 में यह निर्दिष्ट किया गया है। इस बुनियादी वास्तविकता को परिवर्तित करने के लिए सन्विधान में संशोधन करना अनिवार्य है। केंद्र और राज्य, दोनों को एक एकल कर,जीएसटी,  अधिरोपित करने के अधिकार प्रदान करना आवश्यक है। अतः जीएसटी विधेयक का सबसे पहला प्रावधान है अनुच्छेद 246 ए को प्रविष्ट करना।
  2. विशेष बहुमत अनिवार्य है : संविधान संशोधन विधेयक के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है - सदन की कुल सदस्यता का बहुमत, साथ ही उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। मतदान हमेशा विभाजन द्वारा होता है। अनुसूची की प्रत्येक उपधारा (उपखंड) पृथक रूप से सदन में मतदान के लिए प्रस्तुत की जाएगी और इसे विशेष बहुमत द्वारा पारित किया जाएगा। हालांकि इन उपधाराओं के संशोधन के लिए सामान्य बहुमत पर्याप्त होगा।
  3. वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के दौरान पहली बार आधिकारिक रूप से प्रस्तावित किये जाने के बाद से लेकर अब तक इस नए कर (जीएसटी) की यात्रा काफी लंबी रही है। वाजपेयी सरकार ने जीएसटी का विचार रखा था, जिसके लिए उसने श्री असीम दासगुप्ता की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था।
  4. राजकोषीय समेकन पर केलकर कार्यदल : वर्ष 2003 में इस कार्यदल ने एफआरबीएम (राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन) का प्रस्ताव करते हुए इस विचार को रखा था।
  5. वर्ष 2006 में श्री पी चिदंबरम ने 28 फरवरी के अपने बजट भाषण के दौरान इस मुद्दे पर आम राय बनाने की मांग की थी। वास्तव में उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे पर आम राय पहले से ही विद्यमान है : "मेरी यह भावना है कि इस विषय में एक व्यापक आम राय है कि देश को एक ऐसे राष्ट्रव्यापी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दिशा में आगे बढना चाहिए जिसे केंद्र और राज्यों के बीच साझा किया जाए। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हम जीएसटी के प्रारंभ के लिए 1 अप्रैल 2010 की तारीख निर्धारित करें। विश्व भर में वस्तुओं और सेवाओं पर कर की दरें समान हैं। यही एक जीएसटी की बुनियाद है। लोगों को जीएसटी के विचार के प्रति अनुकूल बनना होगा"।
  6. इसे वर्ष 2007 को भी दोहराया गया। उस समय से लेकर अब तक प्रत्येक बजट भाषण में इसी प्रकार का एक परिछेद दृश्य हुआ है। हर बार जीएसटी की दिशा में शीघ्रता से बढने की बात कही गई। परंतु जीएसटी ने कभी भी दिन के प्रकाश के दर्शन नहीं किये। नई दिल्ली और राज्यों के बीच और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सघन सौदेबाजी लगातार जारी रही है।
  7. 10 मई 2007 को राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति ने एक संयुक्त कार्यदल गठित करने का निर्णय लिया। 30 अप्रैल 2008 को इस कार्यदल ने डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को "भारत में जीएसटी के लिए एक मॉडल और प्रस्तावित मानचित्र" पस्तुत किया।
  8. (ए) आर्थिक गतिविधि पर कर लगाने की राज्यों की क्षमता को त्यागने के बदले राज्यों को प्रदान की जाने वाली क्षतिपूर्ति, (बी) जीएसटी की वह दर जो राजस्व की दृष्टि से निष्पक्ष हो, (सी) राज्य की सीमाओं के पार परिवहन की जाने वाली वस्तुओं पर एक अल्प अतिरिक्त शुल्क अधिरोपित किया जाए या नहीं, और (डी) क्या संविधान में जीएसटी की एक अधिकतम दर लिखी जाए, इन सभी विषयों के बारे में अनेक प्रकार की बहसें होती रही हैं।
  9. 10 नवंबर 2009 को अधिकार प्राप्त समिति ने वस्तु एवं सेवा कर पर एक विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया। दिसंबर 2009 में श्री केलकर ने 13 वें वित्त आयोग की अध्यक्षता की और जीएसटी पर कुछ सुझाव दिए।
  10. फरवरी 2010 में तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी के प्रारंभ को अप्रैल 2011 तक विलंबित कर दिया।
  11. मार्च 2011 में जीएसटी को अधिरोपित करने की क्षमता निर्माण करने के लिए संविधान (115 वां संशोधन) विधेयक, 2011 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक पारित नहीं हो पाया।
  12. अगस्त 2013 में समिति ने संसद में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। हालांकि 15 वीं लोकसभा के विसर्जन के साथ ही यह विधेयक कालातीत हो गया।
  13. दिसंबर 2014 में मंत्रिमंडल ने संविधान (122 वां संशोधन) विधेयक, 2014 को अनुमोदन प्रदान किया।
  14. दिसंबर 2014 में विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया।
  15. अंततः 6 मई 2015 को भारतीय संसद की लोकसभा (जनता का सदन) ने वस्तु एवं सेवा कर के लिए संविधान (122 वां) संशोधन विधेयक, 2014 पारित कर दिया।


  16. 12 मई 2015 को विधेयक राज्यसभा को भेजा गया।
  17. 14 मई 2015 को विधेयक को लोकसभा एवं राज्यसभा की संयुक्त समिति को भेजा गया।
  18. 22 जुलाई 2015 को प्रवर समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। हालांकि राजनीतिक आम राय के अभाव में चीजें अगले वर्ष तक के लिए लंबित हो गईं।
  19. जून 2016 में वित्त मंत्रालय ने मॉडल जीएसटी विधेयक का मसौदा प्रकाशित किया। संपूर्ण दस्तावेज यहाँ पढें
  20. सरकार ने तीन मोर्चों पर लचीला रुख अपनाया। उसने अंतर राज्य विक्रय पर प्रस्तावित 1 प्रतिशत कर का प्रस्ताव हटा दिया, एक विवाद निवारण तंत्र की आवश्यकता को मान्य किया, और राज्यों को उनके अप्रत्यक्ष करों के संग्रहण पर होने वाली किसी भी हानि पर संपूर्ण पांच वर्षों तक क्षतिपूर्ति प्रदान करने की स्वीकृति दी।
  21. 1 अगस्त 2016 को वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने विधेयक पर राजनीतिक आम राय पर आधारित संशोधनों को प्रस्तुत किया।
  22. 3 अगस्त 2016 को विधेयक राज्यसभा में बहस के लिए प्रस्तुत हुआ, और एक शालीन और सघन बहस के पश्चात यह सफलतापूर्वक पारित हुआ। और इस प्रकार एक दीर्घ-प्रतीक्षित स्वप्न साकार हुआ। अब संशोधन पारित होंगे लोक सभा से।
  23. राज्यसभा द्वारा इसे पारित करने के बाद आगे क्या होगा? राज्यसभा द्वारा इसे पारित करने मात्र से ही कहानी का अंत नहीं होता। राज्यसभा में इसे पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था। राज्यसभा द्वारा इसे आवश्यक बहुमत से पारित किया गया और अब लोकसभा इसमें हुए संशोधनों को मंजूरी प्रदान करेगी।
  24. इसके पश्चात बाद विधेयक की राष्ट्रपति द्वारा अधिनियमन के रूप में मंजूरी से पहले न्यूनतम 15 राज्यों (50 प्रतिशत) द्वारा उनकी संबंधित विधान सभाओं के मध्यम से विधेयक की प्रतिपुष्टि की जाना आवश्यक था। सरकार को उम्मीद थी की सितंबर २०१६ अंत तक यह कर लिया जायेगा। किन्तु उसके काफी पहले ही यह हो गया. ०८ सितंबर २०१६ तक, १८ राज्यों ने विधेयक को अनुमोदित कर दिया था, जिसमें शामिल थे असम, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली, नागालैंड, महाराष्ट्र, हरियाणा, सिक्किम, मिजोरम, तेलंगाना, गोवा, ओडिशा और राजस्थान। पुडुचेरी केंद्र-शासित प्रदेश ने भी अनुमोदन कर दिया था.
  25. भारत का संविधान ०८ सितंबर २०१६ को संशोधित हो गया जब राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने जीएसटी हेतु संविधान (१२२वें) संशोधन विधेयक २०१४ को अपनी मंज़ूरी दे दी.
  26. विधेयक के अधिनियमन के 60 दिन के अंदर केंद्र और राज्यों के प्रतिनिधियों वाली जीएसटी परिषद् का गठन किया जाएगा।
  27. जीएसटी परिषद् केंद्र और राज्यों को आदर्श वस्तु एवं सेवा कर कानूनों, वस्तु एवं सेवा कर के बंधनों के साथ न्यूनतम नियत दरों सहित अन्य दरों, आपूर्ति नियमों के स्थान और परिषद् की दृष्टि से आवश्यक जीएसटी से संबंधित अन्य सभी मामलों पर सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। सरकार का प्रयास है की ०१ अप्रैल २०१७ से जीएसटी परिषद् को प्रभावी कर दिया जाये।
  28. वास्तविक जीएसटी दरों के विधेयक (केंद्रीय जीएसटी विधेयक और एकीकृत जीएसटी विधेयक) संसद प्रस्तुत किये जाएंगे। यह काफी गर्मागर्म बहस का विषय बना हुआ है कि सरकार को इसे धन विधेयक के रूप में (जो संभवतः सरकार करना नहीं चाहेगी) प्रस्तुत करना चाहिए या नहीं। ये कानून जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होगा और उसे इसके लिए स्वतंत्र कानून पारित करना होगा। राज्यों को भी उनके अपने जीएसटी कानून पारित करने होंगे।
  29. जीएसटी दरों (जो अभी 18 प्रतिशत पर बंधी हुई है) पर आम राय प्रस्थापित होना शेष है। वित्त मंत्रालय को इसके लिए ईसीएसएफएम (राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति) और जीएसटी परिषद् के साथ विचार-विमर्श करना होगा।
  30. जीएसटी के अंतर्गत भुगतान की व्यापार प्रक्रियाओं, पंजीकरण प्रतिदाय और विवरण पर बनी राज्य वित्त मंत्रियों की उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा गठित संयुक्त समिति की विभिन्न रिपोर्ट्स जारी कर दी गई हैं और इन्हें सुझावों के लिए सार्वजनिक अधिकार क्षेत्र में रखा गया है।
  31. संभावना है कि मसौदा जीएसटी कानून और आपूर्ति नियमों का स्थान निर्मित किया जाएगा और इसे टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक कार्यक्षेत्र में रखा जाएगा।
  32. जीएसटी संजाल, जो जीएसटी का मुख्य आधार है, जो ऑनलाइन पंजीकरण, कर भुगतान और विवरण प्रस्तुतीकरण को सुविधाजनक बनाएगा, शीघ्र ही शुरू किया जाएगा।
  33. राज्य अपने-अपने संबंधित जीएसटी कानून बनाएँगे ताकि वे जीएसटी का क्रियान्वयन कर सकें। यह केंद्रीय जीएसटी कानून के आधार पर ही बनाए जाएंगे।

यहाँ इस संपूर्ण यात्रा की चित्रमय प्रस्तुति दी गई है।

2.1 वर्ष 2011, 2014 और 2016 के विधेयकों और संशोधनों की तुलना

  1. वर्ष 2011 का विधेयक जीएसटी को निम्नानुसार परिभाषित करता है "कच्चे पेट्रोलियम, उच्च गति डीजल, मोटर स्पिरिट (पेट्रोल), प्राकृतिक गैस, उड्डयन टरबाइन ईंधन और मानव उपभोग के लिए मद्यिक पेय की आपूर्ति को छोडकर अन्य वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर कोई भी कर"। वर्ष 2014 का विधेयक जीएसटी को निम्नानुसार परिभाषित करता है "मानव उपभोग के लिए मद्यिक पेय की आपूर्ति पर कर को छोडकर अन्य वस्तुओं और सेवाओं पर अधिरोपित किया गया कोई भी कर"।
  2. वर्ष 2011 के विधेयक में जीएसटी के कारण राजस्व में होने वाली किसी भी हानि और कर की सामंजस्यपूर्ण संरचना पर पडने वाले प्रभाव से जुडे मामलों पर केंद्र और राज्यों के बीच निर्मित होने वाले विवादों पर न्यायनिर्णय के लिए वस्तु एवं सेवा कर विवाद निवारण प्राधिकरण के निर्माण का प्रावधान किया गया है। वर्ष 2014 के विधेयक ने इस प्रकार के प्राधिकरण के प्रावधान को समाप्त कर दिया था।
  3. साथ ही वर्ष 2014 के विधेयक ने 2011 के विधेयक के निम्न प्रावधानों को भी समाप्त किया :
    1. वह प्रावधान जो राज्यों को उन वस्तुओं पर कर लगाने से प्रतिबंधित करता था जिन्हें अंतर राज्य व्यापार और वाणिज्य की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है।
    2. वह प्रावधान जो राज्यों को किसी स्थानीय क्षेत्र में वस्तुओं के प्रवेश पर उस हद तक प्रवेश कर अधिरोपित करने की अनुमति देता था जो पंचायत या नगरपालिका द्वारा उपभोग या विक्रय पर अधिरोपित किया गया है।
  4. वर्ष 2014 का विधेयक संसद और राज्यों की विधान सभाओं को एक वस्तु एवं सेवा कर अधिरोपित करने का समवर्ती अधिकार प्रदान करने के लिए संविधान में संशोधन करता है। इसका निहितार्थ यह है कि केंद्र एक केंद्रीय जीएसटी अधिरोपित करेगा जबकि राज्यों को राज्य जीएसटी अधिरोपित करने की अनुमति होगी। ऐसी वस्तुएं और सेवाएं जो विभिन्न राज्यों से होकर गुजरती हैं, या आयातों पर केंद्र एक अन्य कर अधिरोपित करेगा, अर्थात एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) । इसकी कार्यप्रणाली इस लेख में अन्यत्र दी गई है।
  5. मानव उपभोग के लिए मद्य को जीएसटी की परिधि से बाहर रखा गया है। साथ ही बाद में किसी समय 5 प्रकार के पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी अधिरोपित किया जाएगा। इसकी तिथि का निर्धारण जीएसटी परिषद् द्वारा किया जाएगा।
  6. जीएसटी परिषद् एक ऐसा निकाय है जिसमें केंद्रीय वित्तमंत्री के साथ ही सभी राज्यों (दिल्ली और पुडुचेरी सहित) के वित्तमंत्री सदस्य के रूप में शामिल हैं। यह जीएसटी के क्रियान्वयन के संबंध में सिफारिशें करेगी, जिसमें जीएसटी की दरें, अधिरोपण के सिद्धांत इत्यादि शामिल हैं। परिषद् उसकी सिफारिशों से उठने वाले विवादों के निराकरण के तौर-तरीकों पर भी निर्णय करेगी।
  7. जीएसटी व्यवस्था के लागू होने के परिणामस्वरूप राज्यों को होने वाली किसी भी प्रकार की राजस्व हानि के लिए राज्यों को क्षतिपूर्ति भी प्रदान की जा सकती है। .यह क्षतिपूर्ति पांच वर्ष तक की अवधि के लिए प्रदान की जा सकती है।
  8. 2016 के संशोधनों द्वारा प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन - ये संशोधन 2014 के विधेयक में तीन प्रमुख परिवर्तन प्रस्तावित करते हैं। इनका संबंध निम्न के साथ है -
    1. 1 प्रतिशत तक अतिरिक्त कर - इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया
    2. राज्यों को क्षतिपूर्ति - पांच वर्ष तक की अवधि के लिए
    3. जीएसटी परिषद् द्वारा विवादों का निराकरण - केंद्र बनाम राज्यों के सभी संभव संयोजन
  9. जीएसटी की दरें अरविंद सुब्रमण्यम समिति द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार हैं।

3.0 जीएसटी तंत्र का एक सरल स्पष्टीकरण

हम एक आपूर्ति श्रृंखला की कल्पना करते हैं बुनकर दर्जी खुदरा व्यापारी ग्राहक

समस्त पर 8 प्रतिशत की जीएसटी दर मानें

बुनकर कच्चे माल का स्रोत खोजता है और कपडा बुनता है। उस कपडे को वह 100 रुपये में दर्जी को बेच देता है, परन्तु उसे जीएसटी का भुगतान करना पडेगा, अतः वह इसे 100 रुपये पर अनुप्रयुक्त करता है। दर्जी के लिए बुनकर का विक्रय मूल्य 108 रुपये हो जाता है, जिसमें से 8 रुपये जीएसटी है।

दर्जी को कपडा 108 रुपये में मिलता है। वह उसे सिलकर एक रेडीमेड शर्ट में परिवर्तित कर देता है। उस शर्ट को वह खुदरा व्यापारी को 250 रुपये में बेच देता है। परंतु उसे जीएसटी का अनुप्रयोग करना है जो 250 रुपये का 8 प्रतिशत है = 20 रुपये। अतः दर्जी का विक्रय मूल्य है 270 रुपये, जिसमें से 20 रुपये जीएसटी है। दर्जी ने 8 रुपये जीएसटी का भुगतान पहले ही कर दिया है, अतः उसे उसके खाते में 12 रुपये (20-80) का श्रेय प्राप्त होगा। बुनकर को 8 रुपये का श्रेय उसके खाते में प्राप्त हो गया। खुदरा व्यापारी उस शर्ट को एक ग्राहक को 550 रुपये में बेच देता है। परंतु उसे भी इसपर 80 प्रतिशत की दर से जीएसटी का अनुप्रयोग करना है। अतः उसका विक्रय मूल्य 500 + 40 = 540 रुपये हो जाता है। इसमें से बुनकर और दर्जी ने क्रमशः 8 रुपये और 12 रुपये का श्रेय प्राप्त कर लिया है, अतः खुदरा व्यापारी 40-20 = 20  रुपये के लिए कर का दावा करता है।

ग्राहक ने शर्ट 540 रुपये में खरीदी। यह गंतव्य बिंदु है। वह उस शर्ट को किसी को बेच नहीं रहा है बल्कि उसका स्वयं उपभोग कर रहा है। अतः उसे कोई कर श्रेय प्राप्त नहीं होगा। वह संपूर्ण 40 रुपये जीएसटी का भुगतान करता है।

अतः इस संपूर्ण चक्र में दावा किया गया कुल कर श्रेय था

बुनकर द्वारा 8 रुपये, दर्जी द्वारा 12 रुपये और खुदरा व्यापारी द्वारा 20 रुपये, इस प्रकार कुल 40 रुपये।

ग्राहक ने कुल 40 रुपये का भुगतान किया।

Now the realistic rate of GST may be around 15%, so the calculations will look like

And the supply chain will look like

अब वास्तविक जीएसटी दर 18 प्रतिशत या उससे भी अधिक हो सकती है।

4.0 वे मुख्य मुद्दे जो नागरिकों को प्रभावित करेंगे

ऐसे तीन प्रमुख मुद्दे हैं जिन्हें समझना आवश्यक है।

  1. एडम स्मिथ (एक ववचार के रूप में पूंजीवाद के जनक) ने कहा था कि "श्रम का विभाजन बाजार के विस्तार के अनुसार सीमित होता है"। दूसरे शब्दों में, जीएसटी के माध्यम से घरेलू बाजार का एकीकरण आर्थिक कौशल में सुधार करेगा। भारतीय आपूर्ति श्रृंखलाओं का विखंडन न्यूनतम हो जाएगा। अपने राजनीतिक एकीकरण के लगभग सात दशक बाद भारत एक साझा बाजार बन जाएगा।
  2. डायमंड मिर्लेस द्वारा दिए गए इष्टतम कराधान के सिद्धांत को वैश्विक स्तर पर कर व्यवस्था की बुनियाद के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसका मुख्य विचार है "उत्पादकता कौशल प्रमेय"। यह कहती है कि इष्टतम कर व्यवस्था को मध्यवर्ती वस्तुओं के उत्पादन पर कर नहीं लगाना चाहिए। मध्यवर्ती वस्तुओं पर किया गया कराधान संसाधनों को अंतिम वस्तुओं के उत्पादन से दूर करता है। कर का भार आय और उपभोग पर पडना चाहिए ताकि कौशल को अधिकतम किया जा सके। भारत का प्रस्तावित जीएसटी मूल्य श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर कर का भुगतान करने के बजाय वास्तव में अंतिम उपभोग पर कराधान है अतः यह डायमंड मिर्लेस के मानदंड के काफी निकट है। जीएसटी प्रभावी रूप से उत्पादन और वितरण पर कराधान को समाप्त करेगा - केवल अंतिम उपभोग पर ही कर अधिरोपित होगा।
  3. वर्ष 2009 में अरबिंद मोदी ने वित्त मंत्रालय के लिए लिखा था जिसमें उन्होंने एक दोषरहित जीएसटी का तर्क दिया था। उन्होंने कहा था कि इससे गरीबों की हानि नहीं होनी चाहिए। अनेक लोगों का कहना है कि दर जितनी अधिक होगी उतनी ही गरीबों की हानि की दृष्टि से प्रतिगाम्यता अधिक होगी। यहाँ मुख्य मुद्दा यह है कि उच्च जीएसटी दर गरीबों को आहत करेगी। अरबिंद मोदी रिपोर्ट ने एक मध्यम 12 प्रतिशत दर का सुझाव दिया था, जिसे नई दिल्ली, राज्यों और  सरकार के स्तर के बीच साझा किया जाएगा। परंतु अब वह दर कहीं भी दृष्टिक्षेप में नहीं है !

भारत जैसे जटिल देश को निश्चित रूप से एक राष्ट्रीय समझदारी की आवश्यकता है - एक सौदेबाजी - व्यापार और वाणिज्य में जटिलता के न्यूनीकरण पर। परंतु यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि इस संपूर्ण प्रक्रिया में कहीं भी गरीबों का नुकसान न होने पाए।

5.0 भारत - एक बाजार

जीएसटी केंद्र की संघीय सरकार और राज्य सरकारों के लिए निधियां निर्मित करेगा, और साथ ही यह केंद्र, राज्यों और स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा अधिरोपित किये जाने वाले करों, शुल्कों और प्रशुल्कों, अधिभारों और उपकरों  के विशाल तंत्र को प्रतिस्थापित करेगा। वर्तमान कर व्यवस्था अर्थव्यवस्था को विखंडित करती है और साथ ही यह अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार के विशाल अवसर प्रदान करती है।

एक भारत का निर्माण करके भारत में निर्माण करें - अधिकांश करों को जीएसटी से प्रतिस्थापित करने से भारत में आदर्श रूप से एक एकल बाजार - 1.3 लोगों के - का निर्माण होगा। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था में अनेक तिमाहियों से 7 प्रतिशत से अधिक की दर से वृद्धि हो रही है। श्री मोदी के "मेक इन इंडिया" के नारे को वास्तविकता में बदलने  सर्वश्रेष्ठ अवसर है एक एकल बाजार के माध्यम से - "एक भारत का निर्माण करके भारत में निर्माण करें", जैसा कि सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है। वर्तमान व्यवस्था उपभोग की तुलना में उत्पादन पर अधिक कर अधिरोपित करती है, और प्रभावी रूप से घरेलू उत्पादकों पर तरजीह देकर आयातकों को अनुवृत्ति देती है। विकृत रूप से, 2 प्रतिशत एक केंद्रीय  विक्रय कर के माध्यम राज्यों के बीच  व्यापार पर भी कर अधिरोपित है। कुछ राज्य अन्य राज्यों से उनके राज्य में प्रवेश करने वाली वस्तुओं और माल पर शुल्क अधिरोपित करते हैं। ट्रकों को आतंरिक जांच चौकियों पर लंबे समय तक खडा करके रखा जाता है।

कंपनियों के समक्ष आने वाली समस्याएं - चूंकि एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच किये जाने वाले व्यापार पर केंद्रीय विक्रय कर अधिरोपित किया जाता है, जबकि इन्वेंटरी के हस्तांतरण पर कोई कर अधिरोपित नहीं किया जाता, अतः कर से बचने के लिए कंपनियों को प्रत्येक राज्य में गोदाम स्थापित करने के लिए मजबूर होना पडता है  .और चूंकि निविष्टियों पर भुगतान किये गए शुल्क वापस नहीं मांगे जा सकते हैं अतः पिछली निविष्टियों पर कर का "प्रपाती" प्रभाव पडता है। इसके कारण मशीनों पर निवेश हतोत्साहित होता है। यह संपूर्ण व्यवस्था कर के इष्टतमीकरण की दृष्टि से कार्य करती है, न कि उत्पादकता के इष्टतमीकरण की दृष्टि से। इसने पिछले अनेक दशकों में भारत को काफी हानि पहुंचाई है।

निश्चित ही, सभी वस्तुओं और सेवाओं के लिए एकल दर और न्यूनतम छूट के साथ  एक दोषरहित जीएसटी भारत की आर्थिक वृद्धि में प्रति वर्ष 0.9 प्रतिशत से 1.7 प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकता है। इसका एक अन्य लाभ यह भी हो सकता है कि एक कागज का पुछल्ला निर्मित किया जा सकता है और कंपनियों के लिए यह प्रेरणा बन सकती है कि कर श्रेय प्राप्त करने के लिए अपने लेनदेनों को उचित रूप  करें ताकि समग्र दृष्टि से कर अपवंचन में काफी हद तक कमी हो सके।

यह प्रस्ताव दिया गया था कि तेल उत्पादों (एक महत्वपूर्ण निविष्टि) पर कर अधिरोपण को एक अनिश्चित भविष्य कालीन तिथि तक लंबित किया जाए। इसने मद्य को पूर्ण छूट प्रदान की।  चूंकि ये दो वर्ग वर्तमान में राज्यों के राजस्व ( और अवैध दलगत निधीयन) के एक बडे हिस्से का निर्माण करते हैं। कांग्रेस ने ठीक ही केंद्रीय विक्रय कर का विरोध किया। परंतु उसकी इस मांग का, कि संविधान में जीएसटी की अधिकतम 18 प्रतिशत की दर को समाहित किया जाए, कोई तार्किक आधार नहीं है।

वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने कुछ रियायतों का सुझाव दिया है : केंद्रीय विक्रय कर को समाप्त करना और जीएसटी के लिए दो बैंड निर्धारित करना (17-18 प्रतिशत की एक मानक दर और कुछ संवेदनशील वस्तुओं के लिए एक न्यून 12 प्रतिशत दर) । समिति ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि मद्य और संपत्ति संबंधी लेनदेनों को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए ; इसके बदले राज्य मद्य और तंबाखू जैसे उत्पादों पर 40 प्रतिशत तक का एक "पाप कर" अधिरोपित कर सकते हैं।

राज्य इस बात से चिंतित हैं कि राज्य शुल्कों की समाप्ति के कारण उनके समग्र कर राजस्व में काफी गिरावट हो सकती है जिसकी भरपाई जीएसटी से प्राप्त होने वाले उनके हिस्से से संभवतः नहीं हो पाएगी। इसीलिए केंद्र सरकार ने उन्हें एक निश्चित अवधि तक क्षतिपूर्ति प्रदान करने का आश्वासन दिया है।

तमिलनाडु का विरोध - भारत एक बहुत ही विविधतापूर्ण और जटिल देश है जहाँ विभिन्न राज्यो की भिन्न-भिन्न आवश्यकताएं हैं। जीएसटी पर तमिलनाडु के विरोध को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। तमिलनाडु सरकार को लगता है कि इस ऐतिहासिक सुधार कार्यक्रम में उसे  प्राप्त नहीं हो रहा है। यह एक ऐसा राज्य है जो विनिर्माण के क्षेत्र में मजबूत है। ऐसे राज्यों को समस्या है क्योंकि जीएसटी एक गन्तव्य कर है अतः इसका परिणाम कर राजस्व के उपभोग सघन राज्यों की दिशा में बहिर्वाह के रूप में होगा (साथ ही केंद्रीय विक्रय कर के चरणबद्ध समापन और अंतर राज्य विक्रय और अंतर राज्य भंडार हस्तांतरण के निविष्टि श्रेय हस्तांतरण गंतव्य राज्यों को होने के कारण भी) । तमिलनाडु का दावा है कि नाममात्र उच्च राजस्व-निष्पक्ष दर निर्धारण की कठिनाई के कारण यह संभावना है कि जीएसटी के तहत तमिलनाडु को 9270 करोड रुपये की राजस्व हानि होगी। तमिलनाडु ने   जोर देकर इस बात की आवश्यकता को दोहराया है कि ऐसे राज्यों द्वारा वहन की जाने वाली संपूर्ण (100 प्रतिशत) राजस्व हानि की कम से कम पांच वर्ष तक क्षतिपूर्ति के लिए एक संवैधानिक रूप से अनिवार्य स्वतंत्र क्षतिपूर्ति तंत्र निर्मित करना आवश्यक है।  वस्तुओं की अंतर राज्य आपूर्ति पर प्रस्तावित 1 प्रतिशत अतिरिक्त उपकर (जिसे अंततः केंद्र सरकार ने वापस ले लिया) के ऐवज में तमिलनाडु का सुझाव था कि जीएसटी वस्तुओं और सेवाओं की अंतरराज्य आपूर्ति पर अधिरोपित किये जाने वाले अंतर राज्य जीएसटी के केंद्रीय जीएसटी का चार प्रतिशत हिस्सा मूल राज्यों को अपने पास रखने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके कारण राजस्व हानि के एक हिस्से की शीघ्र क्षतिपूर्ति सुनिश्चित होगी साथ ही देय क्षतिपूर्ति की राशि भी कम हो जाएगी। जिन राज्यों में अधिकांश विनिर्माण उद्योग हैं ऐसे राज्यों के लिए गंतव्य आधारित जीएसटी के माध्यम से एकीकृत अप्रत्यक्ष कर आधार को केंद्र के साथ साझा करने का अर्थ यह होगा कि वहां उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के साथ ही कर राजस्व का बहिर्वाह ऐसे राज्यों की ओर होगा जो इन वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करते हैं। इस दृष्टि से जीएसटी विनिर्माणकर्ता राज्यों के लिए कोई प्रोत्साहन प्रदर्सन नहीं करता। हालांकि विधेयक में राज्यों के कर राजस्व की हानि की पांच वर्ष तक क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है। एक बार यह क्षतिपूर्ति प्रदान करने की अवधि समाप्त होने के बाद इस बात में संदेह है कि जीएसटी वाहन विनिर्माणकर्ता राज्यों को उनकी वर्तमान राजस्व प्राप्ति के स्तर पर लाने में सहायक हो पाएगा या नहीं।

समग्र दृष्टि से जीएसटी राज्यसभा में, और तत्पश्चात लोक सभा एवं समुचित संख्या में राज्य विधानसभाओं में, अधिक कठिनाई बिना पारित हो गया। इसी के बाद ०८ सितंबर २०१६ को संविधान संशोधन हो गया. काफी हद तक प्रणालीगत परिवर्तन अब होंगे।

6.0 जीएसटी के क्षेत्रवार लाभ

जीएसटी के अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ होंगे। कुछ उदाहरण नीचे सूचीबद्ध किये गए हैं।

  1. बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाएं :
      1. निविष्टि कर के श्रेय प्राप्त करने की दृष्टि से चूंकि अर्थव्यवस्था का बडा हिस्सा जीएसटी की परिधि में आ जाएगा, अतः बैंकिंग कार्यों की व्याप्ति में काफी अधिक विस्तार होगा।
      2. वस्तुओं के क्रय पर जीएसटी श्रेयों के कारण समग्र श्रेय भंडार में वृद्धि होने की संभावना है।
      3. जीएसटी के अंतर्गत ऋणों के ब्याज पर कर अधिरोपित किये जाने की संभावना है।
  2. अधोसंरचना और रियल एस्टेट :
      1. वैट, सेवा कर, प्रवेश कर इत्यादि जैसे बहुविध करों की समाप्ति द्वारा संयुक्त लेनदेनों पर सरलीकृत करारोपण और मूल्यांकन।
      2. संयुक्त अनुबंधों को "सेवाएं" माने जाने की संभावना है जिसके कारण  मुकदमेबाजी की संभावना काफी हद तक समाप्त हो जाएगी।
  3. सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूर संचार :
      1. वैट, सेवा कर, प्रवेश कर इत्यादि जैसे बहुविध करों की समाप्ति द्वारा संयुक्त लेनदेनों पर सरलीकृत करारोपण और मूल्यांकन।
      2. सिम कार्ड, फ्रेंचाइजी शुल्क, वार्षिक संधारण अनुबंध इत्यादि जैसे मदों के लिए वस्तुओं और सेवाओं के बीच वर्गीकरण संबंधी विवादों की समाप्ति।
  4. सेवाएं :
      1. वस्तुओं और सेवाओं के बीच वर्गीकरण संबंधी विवादों की समाप्ति।
      2. उच्च कर अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए छोटी नकारात्मक सूची।
  5. विनिर्माण और खुदरा :
      1. अंतर राज्य विक्रय पर पूर्ण श्रेय खरीद और उत्पादन लागत को कम करेगा।
      2. आयातित वस्तुओं का श्रेय उन्हें खुदरा व्यापारियों के लिए अधिक सस्ता बना देगा।
      3.   प्रवेश कर की समाप्ति।
      4. वस्तुओं और सेवाओं पर श्रेय की अधिक विनिमेयता।
  6. मीडिया और आतिथ्य सत्कार :
      1. मनोरंजन कर, विलासिता कर, वैट इत्यादि जैसे करों की विविधत को समाप्त करता है।
      2. वस्तुओं और सेवाओं के बीच विनिमेय श्रेय का सर्वाधिक लाभ मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र को होगा।

इस प्रकार, मूल्यों में कमी होने के कारण कम से कम पांच क्षेत्रों से निर्यात को बढावा मिलना चाहिए। ये क्षेत्र हैं - रसायन, लोहा एवं इस्पात उद्योग, खाद्य और वस्त्रोद्योग की मशीनें, कृषि मशीनें, और प्लास्टिक और रबर उत्पाद।

7.0 जीएसटी के समग्र लाभ

  1. कर के प्रपाती प्रभाव न होने के कारण महंगाई भडकने की न्यूनतम संभावना।
  2. एक ही कर सभी प्रकार के अप्रत्यक्ष करों को समाहित करने के कारण कर प्रशासन सरल और आसान हो जाएगा।
  3. केंद्र और राज्यों के कर प्रशासनों में सामंजस्य होने से दोहरीकरण और अनुपालन लागतें कम होंगी। कर संबंधी विवाद और परिणामी मुकदमेबाजी कम होगी।
  4. भारत एक विखंडित बाजारों के समूह की बजाय एक एकल बाजार बन जाएगा जिसके कारण मुक्त परिवहन और आदान-प्रदान संभव होगा।
  5. अल्प विकसित राज्यों को बढावा मिलेगा क्योंकि 2 प्रतिशत अंतर राज्य करारोपण का अर्थ है उत्पादन राज्य के भीतर ही रखा जाएगा। जीएसटी राष्ट्रीय बाजार में इसका बिखराव हो सकता है।
  6. कंपनियों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण "मेक इन इंडिया" संभव हो पाएगा।
  7. अधिक व्यापक कर आधार, जो कर की दरों को कम करने और वर्गीकरण संबंधी विवादों को समाप्त करने की दृष्टि से अनिवार्य है।
  8. राज्यों की सीमाओं के पार न्यूनतम प्रवेश औपचारिकताओं के कारण परिवर्तनकाल।
  9. गंतव्य सिद्धांत और शून्य मूल्यांकन, जिसके कारण उपभोक्ता राज्यों द्वारा जीएसटी संग्रहण और शून्य मूल्यांकन के कारण निर्यात लाभ क्योंकि करों का निर्यात नहीं किया जा सकेगा !
  10. कर के प्रपाती प्रभाव इत्यादि की समाप्ति के कारण जीडीपी को बढावा मिलेगा।

7.1 जीएसटी के लाभों के विषय में सरकार का मूल्यांकन

भारत सरकार सोचती है कि जीएसटी के निम्नलिखित लाभ होंगे।

  1. व्यापार और उद्योगों के लिए
    • सरल अनुपालन: एक मजबूत और व्यापक सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था भारत में जीएसटी शासन की नींव होगी। अतः पंजीकरण, विवरण प्रस्तुति, भुगतान इत्यादि जैसी सभी कर आदाता सेवाएं कर दाताओं को ऑनलाइन उपलब्ध होंगी जिसके कारण कर अनुपालन आसान और पारदर्शी हो जाएगा।
    • कर दरों और संरचनाओं में समानता: जीएसटी यह सुनिश्चित करेगा कि अप्रत्यक्ष कर दरें संपूर्ण देश में समान होंगी, इस प्रकार व्यापार करने की सुनिश्चितता और सहजता में वृद्धि होगी। दूसरे शब्दों में, जीएसटी देश में व्यापार करने के काम को कर निष्पक्ष बना देगा, फिर व्यापार का स्थान का चयन कोई भी क्यों न हो।
    • कर के प्रपाती प्रभाव की समाप्ति: संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में एक निर्बाध और अखंड कर श्रेय व्यवस्था यह सुनिश्चित करेगी कि करों का प्रपाती प्रभाव न्यूनतम हो। यह व्यापार करने की अदृश्य लागतों में कमी करेगा।
    • सुधारित प्रतिस्पर्धात्मकता: व्यापार की लेनदेन लागतों में कमी अंततः व्यापार और उद्योगों के लिए एक अधिक सुधारित प्रतिस्पर्धात्मकता में परिणामित होगी।
    • विनिर्माताओं और निर्यातकों को लाभ: प्रमुख केंद्रीय और राज्यों के करों का जीएसटी में समावेश, निविष्टि वस्तुओं और सेवाओं का संपूर्ण और व्यापक व्यतिरेक और केंद्रीय विक्रय कर की चरणबद्ध समाप्ति स्थानीय स्तर पर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की लागतों में कमी करेंगे। इसके कारण भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होगी जो भारतीय निर्यातों को बढावा देगा। संपूर्ण देश में कर दरों और प्रक्रियाओं में समानता की भी अनुपालन लागत में कमी करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
  2. केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए
    • प्रशासित करने की दृष्टि से सरल एवं आसान: केंद्रीय और राज्य स्तर पर करों की बहुविधता जीएसटी द्वारा प्रतिस्थापित होगी। एक मजबूत अंत-से-अंत सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था की सहायता से जीएसटी का प्रशासन अब तक अधिरोपित किये गए सभी अन्य अप्रत्यक्ष करों की तुलना में अधिक सरल एवं आसान हो जाएगा।
    • रिसावों पर अधिक बेहतर नियंत्रण: एक मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी अधोसंरचना के कारण जीएसटी का परिणाम बेहतर कर अनुपालन में होगा। मूल्य संवर्धन की श्रृंखला में एक चरण से दूसरे चरण में निविष्टि कर श्रेयों के निर्बाध हस्तांतरण के कारण जीएसटी की संरचना में एक अंतर्निहित तंत्र है जो व्यापारियों द्वारा कर अनुपालन को प्रोत्साहन देगा।
    • अधिक उच्च राजस्व कौशल: ऐसा अनुमान है कि जीएसटी सरकार के कर राजस्व संग्रहण की लागत में कमी करेगा अतः इसके कारण राजस्व कुशलता अधिक उच्च होगी।
  3. उपभोक्ता के लिए
    • एकल और पारदर्शी कर जो वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य के आनुपातिक होगा: केंद्र और राज्य द्वारा अधिरोपित बहुविध अप्रत्यक्ष करों के कारण, जिनमें मूल्य संवर्धन के प्रगतिशील चरणों पर अपूर्ण निविष्टि कर श्रेय या किसी प्रकार के निविष्टि कर श्रेय प्राप्त नहीं होने के कारण आज देश की अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं की लागत पर अनेक प्रच्छन्न करों का बोझ है। जीएसटी के अंतर्गत विनिर्माता से लेकर उपभोक्ता तक केवल एक ही कर होगा, जिसके कारण अंतिम उपभोक्ता को भुगतान किये गए कर पारदर्शी हो जाएंगे।
    • समग्र कर भार में राहत: कौशल लाभों और रिसावों के निवारण के कारण अधिकांश वस्तुओं पर समग्र कर भार कम हो जाएगा जिसके कारण उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा।

7.2 जीएसटी का चित्रात्मक प्रदर्शन

संपूर्ण जीएसटी व्यवस्था कैसी दिखेगी यह नीचे दर्शाया गया है -

 

जीएसटी संजाल (नेटवर्क) (जीएसटीएन) कैसा दिखेगा यह नीचे दर्शाया गया है -

8.0 जीएसटी की तकनीकी बारीकियां

जीएसटी की परिभाषा करते हुए इसे मानव उपभोग के लिए मद्य को छोडकर अन्य वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगाया गया कोई कर कहा गया है।

जीएसटी एक मूल्य संवर्धित कर है जो आपूर्ति श्रृंखला के सभी बिंदुओं पर अधिरोपित किया जाता है, और जिसमें आपूर्ति में उपयोग के लिए प्राप्त की गई निविष्टियों पर भुगतान किये गए किसी भी कर के श्रेय प्राप्त करने की अनुमति है। यह वस्तुओं और सेवाओं, दोनों पर व्यापक रूप से अनुप्रयुक्त होगा जिसमें छूट की संभावनाएं न्यूनतम स्तर तक सीमित की गई हैं।

भारत राज्यों का एक परिसंघ है (वास्तव में देखा जाए तो हम अर्ध संघीय हैं क्योंकि इसमें आधारभूत एकल प्रकृति का संधारण किया गया है) । इस संघीय संरचना के परिप्रेक्ष्य में यह प्रस्ताव दिया गया है कि जीएसटी का अधिरोपण केंद्र (सीजीएसटी) और राज्यों (एसजीएसटी) द्वारा साथ-साथ किया जाये। ऐसी संभावना है कि सीजीएसटी और एसजीएसटी के बीच (व्यक्तिगत रूप से सभी राज्यों के एसजीएसटी में) आधार एवं अन्य अनिवार्य संरचनात्मक विशेषताएं समान होंगी। सीजीएसटी और एसजीएसटी दोनों ही गंतव्य सिद्धांत के आधार पर अधिरोपित होंगे। इस प्रकार निर्यात शून्य मूल्यांकित होंगे, और आयातों पर कर उसी प्रकार अधिरोपित होगा जैसे वह घरेलू वस्तुओं और सेवाओं पर अधिरोपित किया जाता है। भारत के अंदर अंतर राज्य आपूर्तियों पर एक एकीकृत जीएसटी (सीजीएसटी और गंतव्य राज्य के एसजीएसटी का सकल) अधिरोपित किया जाएगा।

आईजीएसटी के अतिरिक्त वस्तुओं की आपूर्ति के संदर्भ में केंद्र द्वारा 1 प्रतिशत तक का एक अतिरिक्त कर अधिरोपित करने का प्रस्ताव है (इसे बाद में वापस ले लिया गया)। इस कर से प्राप्त राजस्व मूल राज्यों को निर्दिष्ट किया जाना है। यह कर प्रारंभिक दो वर्षों या ऐसी लंबी अवधि  के लिए अधिरोपित करने का प्रस्ताव है जिसकी जीएसटी परिषद् द्वारा सिफारिश की गई है।

जीएसटी की दर क्या है? मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाले समूह ने एक त्रि स्तरीय दर संरचना की सिफारिश की है। जो वस्तुएं गरीबों के लिए हैं उनपर 12 प्रतिशत, अधिकांश वस्तुओं के लिए 17-18 प्रतिशत की एक मानक दर और विलासिता की वस्तुओं पर 40 प्रतिशत। सामान्य आम राय यह है कि मानक दर 20 प्रतिशत से अधिक और 16 प्रतिशत से कम नहीं हो सकती।

8.1 भारतीय जीएसटी व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं

  1. अंतर राज्य व्यापार और वाणिज्य की आपूर्तियों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार में ही निहित होगा। राज्यों को सेवाओं सहित राज्यांतर्गत लेनदेनों पर जीएसटी अधिरोपित करने का अधिकार होगा।
  2. केंद्र वस्तुओं और सेवाओं की  अंतर राज्य आपूर्ति पर आईजीएसटी अधिरोपित करेगा। वस्तुओं का आयात मूलभूत सीमा शुल्क और आईजीएसटी आकर्षित करेगा।
  3. जीएसटी को,मानव उपभोग के लिए मद्य को छोडकर अन्य सभी वस्तुओं और सेवाओं पर अधिरोपित किया गया कोई कर, के रूप में परिभाषित किया गया है।
  4. केंद्रीय उत्पादन शुल्क, अतिरिक्त उत्पादन शुल्क, सेवा कर, अतिरिक्त सीमा शुल्क और विशेष अतिरिक्त शुल्क जैसे केंद्रीय कर और वैट या विक्रय कर, केंद्रीय विक्रय कर, मनोरंजन कर, प्रवेश कर, क्रय कर, विलासिता कर और चुंगी जैसे राज्य के कर जीएसटी में समाहित हो जाएंगे। अर्थात उनका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
  5. कच्चे तेल, उच्च गति डीजल, मोटर स्पिरिट, विमानन टरबाइन ईंधन और प्राकृतिक गैस जैसे पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पाद जीएसटी परिषद् द्वारा अधिसूचित तिथि से जीएसटी के अधीन आएंगे।
  6. वस्तुओं की अंतर राज्य आपूर्ति पर अधिरोपित किया जाने वाला 1 प्रतिशत मूल आधारित अतिरिक्त कर जीएसटी श्रृंखला में गैर श्रेय प्राप्य होगा। इस कर से प्राप्त राजस्व मूल राज्य को अंतर्निहित किया जाना है। यह कर प्रारंभिक दो वर्षों के लिए या ऐसी समयावधि के लिए, जो जीएसटी परिषद् द्वारा तय की जानी है, अधिरोपित किया जाना है।
  7. समस्त भारत में प्रवेश कर / चुंगी के अधिरोपण की समाप्ति का प्रावधान।
  8. राज्य सरकारों द्वारा फिल्मों, नाट्य गृहों इत्यादि  पर अधिरोपित किया जाने वाला मनोरंजन कर जीएसटी में समाहित किया जाएगा, परंतु पंचायत, नगरपालिका या जिला स्तर के मनोरंजन कर जारी रहेंगे।
  9. समाचारपत्रों की बिक्री और विज्ञापनों पर भी जीएसटी अधिरोपित किया जा सकता है और इससे सरकार के राजस्व में काफी वृद्धि होने की संभावना है।
  10. मुद्रांक शुल्क, जो आमतौर पर राज्यों द्वारा न्यायिक समझौतों पर अधिरोपित किये जाते हैं, आगे भी राज्यों द्वारा अधिरोपित किये जाते रहेंगे।
  11. जीएसटी के प्रशासन की जिम्मेदारी जीएसटी परिषद् की होगी, जो जीएसटी के लिए शीर्ष नीति निर्माण निकाय होगा। जीएसटी सदस्यों के रूप में राज्यों के वित्त मंत्रालयों के प्रभारी मंत्री होंगे।

इस प्रकार, जैसा पहले कहा गया है जीएसटी के कारण करों के प्रपाती प्रभाव से मुक्ति मिलेगी, जिसका परिणाम न्यूनतम महंगाई भडकने पर होगा। यह कर अन्य सभी अप्रत्यक्ष करों को समाहित करने वाला एकल कर होगा जिसके परिणामस्वरूप कर प्रशासन सरल हो जाएगा। भारत विखंडित बाजारों के समूह के स्थान पर एक एकल बाजार बन जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप वस्तुओं और सेवाओं का मुक्त प्रवाह संभव हो जाएगा। कर विवाद और मुकदमेबाजी कम हो जाएगी। राज्यों की सीमाओं के पार न्यूनतम प्रवेश औपचारिकताओं के कारण प्रतिवर्तन काल अधिक शीघ्र होगा। गंतव्य सिद्धांत और शून्य मूल्यांकन, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता राज्यों द्वारा जीएसटी का संग्रहण होगा और शून्य मूल्यांकन के कारण निर्यात लाभ क्योंकि कर निर्यात नहीं किये जा सकेंगे!

भारत के उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की व्याप्ति की कल्पना करने के लिए इन चित्रों का अवलोकन करें।

 

जीएसटी के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों को निम्न प्रकार से सारांशित किया जा सकता है -

9.0 किसे लाभ होगा - निगमों को या नागरिकों को?

जैसे बताया गया है, जीएसटी विधेयक का लक्ष्य एक नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के माध्यम से सभी राज्यों को एक एकल बाजार में परिवर्तित करने का है, जिसमें उत्पादन शुल्क, विक्रय कर और सेवा कर जैसे शुल्क समाहित हो जाएंगे। बडा सवाल यह है - क्या इससे उपभोक्ता लाभांवित होगा?

हाँ, यदि निगम उन्हें मिलने वाले लाभ हस्तांतरित करें। वस्तुओं के मामले में उत्पादन शुल्क, मूल्य संवर्धित कर और केंद्रीय विक्रय कर जैसे अप्रत्यक्ष कर उपभोक्ता द्वारा भुगतान की जाने वाली कीमतों में अंतर्निहित हैं। उदाहरणार्थ, टूथपेस्ट। मान लीजिये इसका मूल्य 52 रुपये है, तो इसका 25-27 प्रतिशत वास्तव में कर लागत है। अब 18-20 प्रतिशत (मान लीजिये) जीएसटी के साथ, जो विभिन्न अप्रत्यक्ष करों को समाहित करता है, आदर्श रूप से कर लागत कम हो जाती है। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनी इस लाभ को हस्तांतरित करना चाहती है या नहीं !

कंपनियां विभिन्न कारकों के आधार पर मूल्य निर्धारण के निर्मय लेती हैं, जिनमें वे जिस उद्योग में हैं, और जिस प्रकार की प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही हैं, यह भी शामिल है। आमतौर पर उपभोक्ताओं को इस प्रकार के लाभ प्राप्त नहीं होते हैं। उपभोक्ता अभाव से ही किसी वस्तु के मूल्य का इसलिए कम भुगतान करते हैं क्योंकि कर कम कर दिए गए हैं (केवल संभवतः मोटर वाहन उद्योग को छोडकर)। अतः प्रारंभ में कुछ चुनी हुई वस्तुओं के मूल्यों में जीएसटी के कारण वृद्धि हो सकती है, परंतु इसका मुद्रास्फीति पर प्रभाव न्यूनतम होगा। जब तक प्रत्येक उत्पाद वर्ग पर अंतिम जीएसटी दर ज्ञात नहीं होती इस प्रकार की गणना काल्पनिक होगी। जीएसटी के साथ वस्तुओं पर समग्र कर कम होने और उनके सस्ती होने की संभावना है। हालांकि जब नया कानून प्रभावी होगा तो कुछ प्रारंभिक समस्याएं आ सकती हैं। दीर्घकाल में वस्तुओं पर अल्प कर भार का परिणाम उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं के कम मूल्यों के रूप में हो सकता है।

क्या निगम लाभान्वित होंगे? हाँ उन्हें तीन प्रकार के लाभ होंगे।

  1. दोहरा कराधान समाप्त हो जाएगा। अतः प्रभावी अप्रत्यक्ष कर कम होने की संभावना है। वर्तमान व्यवस्था में निगम कर पर कर का भुगतान करते हैं, क्योंकि वर्तमान कर व्यवस्था में संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में निविष्टि कर श्रेय का प्रावधान नहीं है।
  2. राज्यों के बीच वस्तुओं का निर्बाध प्रवाह परिवहन खर्चों और इन्वेंटरी प्रबंधन लागतों को कम करेगा जो भारत में काफी ऊंची हैं।
  3. अंतर्निहित स्व पुलिसिंग के माध्यम से असंगठित और संगठित प्रतिद्वंद्वियों के बीच संकीर्ण भिन्नताएं। चूंकि मूल्य श्रृंखला के पिछले सभी चरणों में भुगतान किये गए करों के श्रेय प्राप्त हो जाते हैं, अतः व्यतिरेक की मांग करने के लिए फर्मों को पिछली कडियों से अनुपालन की साक्ष्य प्राप्त होना आवश्यक है। इस प्रकार, सभी ईमानदार फर्मों के साथ व्यापार करना चाहेंगे जो अपने सभी दस्तावेजों का व्यवस्थित संधारण करती हों। इसके कारण बडे पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों की कर संजाल में आने की संभावना है, जिसके कारण संगठित प्रतिद्वंद्वियों के समक्ष उनकी मूल्य प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी।
  4. जैसे-जैसे निगमों को अधिकाधिक निविष्टि श्रेय प्राप्त होते जाएंगे वैसे-वैसे उनकी शुद्ध कर लागत कम होती जाएगी, और चूंकि अनेक कर एक ही कर में समाहित हो जाएंगे अतः उनकी अनुपालन की आवश्यकता भी कम हो जाएगी।

क्या अर्थव्यवस्था लाभांवित होगी? अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि जीएसटी के क्रियान्वयन के बाद अर्थव्यवस्था में 1.5 प्रतिशत से 2 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यह करों को कम करेगा और अनुपालन में वृद्धि करेगा, जिसके कारण सरकार के लिए कर राजस्व में वृद्धि होगी। वस्तुओं का प्रवाह अधिक तेज गति से, आसानी से और सस्ता होगा। इसके कारण अर्थव्यवस्था को बढावा मिलने की संभावना है।

10.0 जीएसटी, धोखाधडी में कमी, पारदर्शिता और आधार  

वर्तमान अप्रत्यक्ष करों की तुलना में जीएसटी के अंतर्गत कर-भार, कर संरचना और व्यतिरेक तंत्र काफी हद तक भिन्न होंगे क्योंकि यह एक उपभोग आधारित कर है। वस्तुओं का कोई भी अंतर राज्य प्रवाह कर आकर्षित करेगा फिर चाहे वह विक्रय हो या नहीं।

कर विवरणों और अनुपालन के लिए सरकार द्वारा जीएसटीएन (वस्तु एवं सेवा कर संजाल) का गठन किया गया है ताकि एक ऑनलाइन मंच निर्मित किया जा सके। अतः आतंरिक कर अधोसंरचना को इन आवश्यकताओं के अनुरूप श्रेणीबद्ध करना आवश्यक है। सभी अनुपालन ऑनलाइन होंगे और इनकी सूचना आवश्यकताएं काफी अधिक होंगी क्योंकि अपलोड किये जाने वाले आंकडे लेनदेन के स्तर पर होंगे। विद्यमान ईआरपी / सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था का मूल्यांकन और उन्नयन करना आवश्यक है ताकि वे जीएसटी शासन के अंतर्गत बढी हुई सूचना / आंकडे आवश्यकताओं का समर्थन करने में सक्षम हों। कुछ लोगों का कहना है कि कर कम होंगे। दीर्घकाल में जीएसटी काफी लाभदायक होगा क्योंकि परिवहन और संचालन लागतें कम होंगी। यह उपभोक्ताओं और उत्पादकों के लिए लाभदायक होगी। संगठनों को अपनी प्रौद्योगिकी अधोसंरचना का उन्नयन करना आवश्यक होगा, क्योंकि जीएसटी शासन के अंतर्गत कर श्रेय, चालानों की पुनर्रचना, कर्मचारियों के प्रशिक्षण और सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था से संबंधित अधिकांश प्रक्रियाएं स्वचालित हैं। चूंकि सभी अप्रत्यक्ष कर जीएसटी में समाहित हो जाएंगे, अतः यह प्रक्रियाओं, कर्मचारियों के प्रशिक्षण और सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्थाओं के विकास में व्यापक परिवर्तन लाएगा। अधिकांश संगठनों ने प्रमुख परिवहन या भंडारण निर्णयों को तब तक के लिए स्थगित रखा है जब तक उन्हें जीएसटी कानूनों के बारे में स्पष्टता नहीं हो जाती। कंपनियों के लिए एक ऐसी आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना आवश्यक है जो जीएसटी शासन के अंतर्गत व्यतिरेक तंत्र को विचार में लेती हो ताकि मूल्य श्रृंखला में होने वाली किसी भी कर हानि से बचा जा सके। विक्रेताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि जीएसटी शासन के अंतर्गत वे पूर्णतः अनुपालक हैं क्योंकि तभी कंपनियां व्यतिरेक के श्रेय प्राप्त कर पाएंगी।

मोटर वाहन क्षेत्र लाभान्वित होगा। यह प्रमुख रूप से इसलिए सकारात्मक होगा क्योंकि जीएसटी के कारण करों का प्रपाती प्रभाव समाप्त हो जाएगा। वर्तमान में अधिकांश वाहन विनिर्माता भारत के कुछ राज्यों में ही स्थित हैं। जब वे अन्य राज्यों में कारें बेचते हैं तो वे 2 प्रतिशत केंद्रीय विक्रय शुल्क अधिरोपित करते हैं, जिसमें कार की लागत भी शामिल है जो श्रेय पात्र नहीं है। जीएसटी शासन में इसपर भी श्रेय उपलब्ध है। वर्तमान में एमआरपी आधारित उत्पादन शुल्क का भुगतान सहायक उपकरणों पर अनुप्रयुक्त है जिसके कारण लागत में वृद्धि हो जाती है, जबकि जीएसटी में यह अनुप्रयुक्त नहीं होगी। आसान श्रेय तंत्र के साथ निविष्टियों पर सभी कर जीएसटी की उत्पादन देयता के समक्ष व्यतिरेक हो जाएंगे। निविष्टियाँ पूंजीगत वस्तुएं भी हो सकती हैं या निविष्टि सेवाएं भी हो सकती हैं, इन सभी पर श्रेय व्यतिरेक के लिए उपलब्ध हैं।

अनेक लोग इसे विनिर्माताओं, खुदरा व्यापारियों, थोक विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं, इन सभी के लिए फायदेमंद मानते हैं क्योंकि ये सभी कर श्रेयों के रूप में निविष्टि लागत पर भुगतान किये गए जीएसटी को वापस प्राप्त कर सकेंगे, जिसके कारण व्यापार करने की लागत में कमी होगी। हालांकि कंपनियों को उनकी उपस्कर वितरण और चालान व्यवस्थाओं का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। आमतौर पर कंपनियां करों से बचने के लिए सभी राज्यों में गोदाम स्थापित करती हैं क्योंकि एक राज्य से दूसरे राज्य में इन्वेंटरी के हस्तांतरण पर केंद्रीय विक्रय कर अधिरोपित नहीं किया जाता जबकि व्यापार पर यह लागू होता है। नया कानून व्यापारियों को उनके परिवहन और भंडारण समाधानों की पुनर्रचना करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

कंपनियों को कर श्रेय प्राप्त करने के लिए अपने लेनदेन घोषित करने के लिए यह कानून काफी प्रोत्साहन प्रदान करता है जिसके कारण समग्र रूप से कर वंचन में भी कमी आएगी। आमतौर पर काफी सारे शासकीय विभाग (कर विभाग) अस्तित्व में हैं, जिसपर पुनर्विचार करना होगा। अब व्यापारियों को बहुविध केंद्रीय और राज्यों के विभागों के बजाय केवल केंद्रीय और राज्य के जीएसटी विभागों से ही काम पडेगा। ऐसी आशा है कि इसके कारण विवादों, मुकदमों और अनुपालन की लागत  में भी काफी हद तक कमी आएगी।

जीएसटी का एक सबसे बडा लाभ यह है कि इसकी रचना एक प्रौद्योगि समर्थित कर व्यवस्था के रूप में जमीनी स्तर से ऊपर की ओर की गई है। पूर्व में सरकार के लिए  धोखाधडी के खतरे का व्यवस्थित रूप से शमन करना व्यवहार्य नहीं था, क्योंकि ऐसी कोई भी व्यवहार्य मानवी क्षमता नहीं थी जो अपराधियों का पता लगाने में सक्षम थी - जो लगातार जाली संगठनों और / या फर्जी चालानों का निर्माण करते रहते थे। हालांकि जीएसटी जालसाजी का पता लगाने की असाधारण क्षमता प्रदान करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फर्जी चालान बनाने की क्षमता को पूर्णतः समाप्त करता है। यह एकमात्र कदम भी इस समस्या को काफी हद तक कम कर देगा।

आधार की लगभग सर्वव्यापकता, और आधार विधेयक के पारित होने के साथ सरकार को यह अनिवार्यता सुनिश्चित करनी होगी कि सभी जीएसटी पंजीकरण उनकी आधार आधारित पहचान के आधार पर व्यक्तिगत रूप से पता लगाने योग्य हों।

11.0 क्या जीएसटी अतिरंजित है?

अर्थव्यवस्था पर अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित कर सामग्री के कम परंतु प्रचार या सुर्खियों में अतिरंजित है। आइये हम ऐसे लोगों की प्रमुख चिंताओं पर विचार करें।

चिंता 1 न्यून कीमतों के कारण क्या उपभोक्ता लाभान्वित होंगे?

जिन लोगों को संदेह है उनका कहना है कि यदि जीएसटी क्रियान्वित होता है तो यह उन अनेक प्रश्नों में से एक है जो पूछा जाना चाहिए। कीमतों में कमी के बारे में दिया जाने वाला तर्क गलत है। यह सही है कि व्यवसायों और व्यापारों द्वारा सामना किये जा रहे कर प्रशासन का सरलीकरण होगा परंतु यह उतना नहीं होगा जितना कहा जा रहा है। देश में तीन कर होंगे - सीजीएसटी, जिसका संग्रहण केंद्र द्वारा किया जाएगा, एसजीएसटी, जिसका संग्रहण राज्यों द्वारा किया जाएग और अंतरराज्य आपूर्तियों पर लगने वाला आईजीएसटी, जिसका संग्रहण केंद्र द्वारा किया जाएगा। साथ ही, राज्यों के दबाव में मद्य, तंबाखू और पेट्रो उत्पादों को संभवतः जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाएगा। उसी प्रकार बिजली और रियल एस्टेट को भी जीएसटी के जाल से बाहर रखे जाने की संभावना है और इनके लिए स्वतंत्र कर होंगे जिसके कारण कुछ हद तक प्रपाती प्रभाव निश्चित रूप से होगा। सेवाओं को पूर्व में विक्रसि कर का भुगतान नहीं करना पडता था परंतु अब उन्हें राज्यों को एसजीएसटी का भुगतान करना होगा अतः उनके मूल्यों में वृद्धि होगी। उदाहरणार्थ, टेलीफोन कॉल्स, बीमा, परिवहन, रेस्त्रां इत्यादि महंगे हो जाएंगे। एक समान कर का निहितार्थ यह होगा कि सभी आधारभूत और अनिवार्य वदसतूओं के मूल्यों में वृद्धि होगी, और यदि कुछ अंतिम उपभोग वस्तुओं के मूल्यों में गिरावट भी होती है फिर भी मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि होगी।

चिंता 2. राजकोषीय संघवाद पर आक्रमण

सभी राज्यों के लिए समान कर दर राजकोषीय संघवाद को कमजोर करती है ; क्योंकि अलग-अलग राज्यों की आवश्यकताएं भिन्न-भिन्न हैं। भारत में जीएसटी के प्रारंभ के साथ वास्तविक  समस्याओं को संबोधित नहीं किया गया है। भारत का असंगठित क्षेत्र लगभग 93 प्रतिशत तक श्रम शक्ति को रोजगार प्रदान करता है। एकीकृत बाजार के कारण स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विक्रय करने वाली लघु और छोटी इकाइयों को नुकसान होगा जो बडे पैमाने पर उत्पादन करने वाले उत्पादकों के लिए लाभदायक होगा। यह प्रच्छन्न रोजगार की समस्या और कृषि क्षेत्र की कठिनाइयों में वृद्धि करेगा और यह गरीब राज्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। कोई आश्चर्य नहीं है कि बडे व्यवसाइयों - भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय, दोनों - जीएसटी का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। केवल वैट के सौ से अधिक देशों में अस्तित्व में होने का यह अर्थ नहीं है कि भारत में यह सभी लोगों को समान रूप से लाभान्वित करेगा।

चिंता 3. क्या जीएसटी के कारण वृद्धि को वास्तव में उत्प्रेरणा मिलेगी?

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी एक अत्यंत अतिरंजित परिकल्पना है। ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि जीएसटी से निवेश और वृद्धि को भारी प्रोत्साहन मिलेगा, परंतु वास्तविकता यह है कि इसका प्रभाव अत्यंत नगण्य होगा। यह एक अत्यंत सुविधाजनक बहाना है कि जीएसटी अभी तक लागू नहीं हो पाया है इसीलिए वृद्धि नहीं हो पा रही है। जहाँ तक एक राष्ट्रीय बाजार के निर्माण का प्रश्न है, तो संपूर्ण देश में एक एकल एकसमान कर शासन के साथ अतिरिक्त केंद्रीकरण भारत के लिए कभी भी लाभदायक नहीं रहा है। जीएसटी के साथ भी यही है। यह दुनिया को यह दिखाने के लिए एक प्रसाधनीय सुधार है कि भारत आर्थिक सुधार कर रहा है। पिछले दो वर्षों में निवेश में वृद्धि असफल रही है। हमने सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में बडे पैमाने पर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का अनुभव किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि जीएसटी एक राजनीतिक मुद्दा है, अतः इसका अतिरंजन किया जा रहा है। जीएसटी का मूल उद्देश्य है कर संरचना का सरलीकरण और एकीकृत कराधान। परंतु यह देखना होगा कि इस उद्देश्य की पूर्ति हो रही है या नहीं।

चिंता 4. भविष्य में क्या होगा?

सामान्य करदाता के मन में प्रस्तावित अप्रत्यक्ष शासन के संबंध में संदेह है। पहला यह कि जीएसटी के लागू होने के बाद क्या भविष्य में नए कर जोडे जाएंगे? यदि अधिकतम सीमा 20 प्रतिशत है तो लोग नहीं चाहते कि भविष्य में इसमें अन्य कर जोडे जाएं। दूसरा, वर्तमान में कुल कर लगभग 33 प्रतिशत बनता है, जबकि जीएसटी केवल 18 से 20 प्रतिशत कर दर की बात करता है। तीसरा, वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होगी। चौथा, कर विभाग और उसके अधिकारियों की भूमिका - क्या वे करदाताओं को डराना जारी रखेंगे? सर्कार को इन मुद्दों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए। सामान्य नागरिक को गंभीर चिंताएं हैं जैसे वर्तमान में सेवा कर लगभग 15 प्रतिशत अधिरोपित किया जाता है, परंतु जीएसटी के लागू होने के बाद यह 18 प्रतिशत हो जाएगा। इसके कारण कुछ सेवाएं महँगी हो जाएंगी। केंद्र सरकार चाहती है कि स्थिर उच्च दर का उल्लेख संविधान में करने के बजाय इसका उल्लेख जीएसटी कानून में किया जाए। यहीं सामान्य उपभोक्ता को संदेह है क्योंकि दीर्घकाल में कराधान की दरें कर प्रशासन और सरकार की मनमर्जी और सनक के अनुसार होंगी। यदि उनमें परिवर्तन किया जाता है तब क्या? सरकार को अपनी प्रतिबद्धता सुनिश्चित करनी होगी।

12.0 जीएसटी को वास्तविकता बनाने के लिए सरकार द्वारा जीएसटीएन में उठाए गए प्रशासनिक कदम

जीएसटीएन द्वारा परिकल्पित प्रौद्योगिकी समाधान की कुछ प्रमुख विशेषताएं जो करदाताओं को आसान और सरल अनुपालन में सहायक होंगी, नीचे सूचीबद्ध की गई हैं

  1. करदाताओं के लिए आसानी जीएसटीएन द्वारा निर्मित की जाने वाली जीएसटी व्यवस्था की  मुख्य विशेषताओं में से एक है। "जीएसटी के लिए सूचना प्रौद्योगिकी रणनीति" यह परिकल्पित करती है कि पंजीकरण के लिए आवेदन करने, कर विवरणों को भरने,  और कर का भुगतान करने की प्रक्रिया सरल, आसान और एकरूप होना चाहिए और इसका करदाता के स्थान और स्थिति या व्यापार व्यवसाय के आकार से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, अनुपालन प्रक्रिया का करदाताओं पर कोई अनावश्यक बोझ नहीं होना चाहिए और यह उनकी व्यापार प्रक्रिया के एक भाग के रूप में होनी चाहिए।
  2. जीएसटीएन "सरलता" और "मानकीकरण" के इन अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति की दृष्टि से काम कर रहा है ताकि स्वैच्छिक अनुपालन को प्रोत्साहित किया जा सके। जीएसटी प्रणाली की कुछ प्रमुख प्रासंगिक विशेषताएं निम्नानुसार उल्लिखित की गई हैं :
  3. पंजीकरण -
    1. ए सभी राज्यों में लागू होने वाले सभी जीएसटी कानूनों के लिए एकसमान पंजीकरण प्रपत्र
    2. बी ऑनलाइन पंजीकरण (अनिवार्य) : पंजीकरण की जानकारी केंद्रीय और संबंधित राज्यों के कर प्राधिकारियों के बीच साझा की जाएगी। जहाँ संभव हो, जानकारी का ऑनलाइन अभिपोषण (वेलिडेशन) किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आवेदक को सहायक दस्तावेजों की स्कैन की हुई प्रतिलिपियों को अपलोड करने की आवश्यकता न पडे (उदाहरणार्थ पैन / आधार / सीआईएन / डीआईएन इत्यादि)
    3. सी कर प्राधिकारियों को कोई भी भौतिक दस्तावेज भेजने की आवश्यकता नहीं होगी
    4. डी आवेदकों / पंजीकरण करवाने वाले व्यक्तियों को उनके पंजीकृत ई-मेल और मोबाइल नंबरों पाए ई-मेल और मोबाइल संदेश भेजे जाएंगे
    5. ई पंजीकरण प्रमाणपत्र ऑनलाइन उपलब्ध करवाये जाएंगे
    6. एफ पंजीकरण प्रदान किये जाने के पूर्व पंजीकरण प्राधिकारी के समक्ष प्रत्यक्ष उपदस्थित होना आवश्यक नहीं होगा
    7. जी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र और आधार-आधारित ई-हस्ताक्षर के लिए सहायता
    8. एच पंजीकरण के बाद पंजीकरण के अनेक खानों में संशोधन स्वयं सहायता के आधार पर होगा (मंजूरी की आवश्यकता के बिना)
  4. कर विवरण प्रस्तुत करना -
    1. ए सभी विभिन्न प्रकार के करों के लिए एक ही समान विवरण प्रपत्र ; प्रति पंजीयन एक विवरण एक कर अवधि के लिए
    2. बी ऑनलाइन विवरण प्रस्तुति अनिवार्य होगी
    3. सी बहुविध विधियों द्वारा (पोर्टल पर प्रत्यक्ष प्रवेश, जीएसटीएन द्वारा प्रदत्त उपकरण, लेखांकन सॉफ्टवेयर के साथ एकीकरण, तृतीय पक्ष के एप्प का उपयोग, इत्यादि) चालानों का अपलोडिंग किसी भी समय सुविधाजनक बनाया जाएगा
    4. डी केवल विक्रय (आपूर्ति) चालान की जानकारी ही अपलोड करनी होगी जो स्वचालित रूप से सामने वाले पक्ष के क्रेता (वस्तुओं और सेवाओं के प्राप्तकर्ताओं) के क्रय रजिस्टर में प्रतिबिंबित हो जाएगी
    5. ई व्यवस्था ही मसौदा विवरण प्रदान करेगी जिसमें करदाता द्वारा संशोधन किया जा सकेगा
  5. कर भुगतान -
    1. ए विभिन्न प्रकार के सभी करों के लिए एक ही चालान ; सभी प्रकार के करों के भुगतान की जानकारी को समाविष्ट करने वाला एक ही चालान
    2. बी ऑनलाइन कर भुगतान (एक निश्चित सीमा के ऊपर अनिवार्य) ; जो लोग काउंटर पर जाकर भुगतान करना चाहते हैं उनके लिए यह अनिवार्य होगा कि उनका चालान जीएसटी व्यवस्था पर ऑनलाइन तैयार किया हुआ हो ताकि डाटा एंट्री में गलतियां न हों
    3. सी सभी अभिकरण बैंकों के साथ एक-से-एक एकीकरण (वर्तमान में सभी राज्य सभी अभिकरण बैंकों में भुगतान की सुविधा नहीं देते हैं)
    4. डी जिनके खाते गैर-अभिकरण बैंकों में हैं वे आरटीजीएस / एनईएफटी के माध्यम से भुगतान कर सकते हैं
    5. ई करदाताओं को भी नियमित रूप से एसएमएस / ई-मेल आधारित संपर्क के माध्यम उनके भुगतानों के संबंध में अद्यतन जानकारी प्राप्त होती रहेगी

13.0 अंतिम सारांश

  1. अप्रत्यक्ष करों की हमारी वर्तमान व्यवस्था अकुशलताओं का भंडार है, जिसके कारण व्यापार-व्यवसाय में अस्तित्व के लिए कर अपवंचन एक प्रकार का मानदंड सा बन गया है, जिसके कारण निहित स्वार्थ निर्माण हो रहे हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर करों  भंवरजाल उत्पाद के उसी मूल्य संवर्धन पर प्रपाती कर अधिरोपित करते रहते हैं जिसके कारण उपभोक्ता तक आते-आते वस्तु के मूल्य में काफी वृद्धि हो जाती है।
  2. वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत पैरों का प्रपाती प्रभाव होता है, जिसके कारण समग्र कर अधिक उच्च हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, एक विनिर्माता 100 रुपये में कच्चा माल खरीदता है जिसपर वर 10 रुपये का निविष्टि कर भुगतान करता है। यदि विनिर्माता उस वस्तु में 50 रुपये का मूल्य संवर्धन करता है, तो थोक विक्रेता के लिए विक्रय मूल्य 176 रुपये हो जाएगा (100 रुपये धन 10 रुपये (कर) धन 50 रुपये (मूल्य संवर्धन)  धन 16 रुपये (160 रुपये पर 10 प्रतिशत कर) । यदि थोक विक्रेता उसमें 24 रुपये का मूल्य संवर्धन करता है, तो वस्तु का कर-पूर्व मूल्य 200 रुपये हो जाता है। अंतिम उपभोक्ता अंततः उस वस्तु के लिए 220 रुपये का भुगतान करेगा (200 रुपये धन 20 रुपये (200 रुपये पर 10 प्रतिशत कर) ।  प्रकार उस उत्पाद पर भुगतान किया गया कुल कर 46 रुपये हो जाता है (10 रुपये धन 16 रुपये धन 20 रुपये) जबकि वांछित कर 17.4 रुपये था (10 रुपये धन 5 रुपये धन 2.4 रुपये) । अतः प्रत्येक चरण पर किये गए मूल्य संवर्धन की तुलना में उपभोक्ता को 28.6 रुपये के अतिरिक्त कर का भुगतान करना पडता है।
  3. प्रपाती कर पण्यावर्त कर (टर्नओवर टैक्स) होते हैं जो आपूर्ति श्रृंखला के प्रत्येक चरण पर अधिरोपित किये जाते हैं, जबकि पूर्व चरण पर भुगतान किये गए कर की किसी प्रकार की छूट नहीं मिलती। ऐसे कर इस दृष्टि से विकृत होते हैं कि वे अनुलंब एकीकरण के लिए कृत्रिम प्रोत्साहन का निर्माण करते हैं। यूरोप और अनेक अन्य अनेक स्थानों पर इन्हें मूल्य संवर्धित कर (वैट) द्वारा प्रतिस्थापित किया जा चुका है।
  4. जीएसटी संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला पर एक मूल्य संवर्धित कर है जो करों के प्रपाती स्वरुप से बचता है। ऊपर के उदाहरण में जीएसटी की गणना 17.4 रुपये होती (10 रुपये धन 5 रुपये धन 2.4 रुपये) । अतः जीएसटी एक विशेष प्रकार का विक्रय कर है, जिसे आमतौर पर मूल्य संवर्धित विक्रय कर कहा जाता है। यह प्रकार इस दृष्टि से विशिष्ट होता है कि यह उत्पादन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों पर उत्पाद के केवल मौद्रिक मूल्य संवर्धन पर ही कर अधिरोपित करता है।
  5. जीएसटी की निम्न दो विशेषताएं हैं :
    1. ए उपभोग विक्रय कर : जीएसटी एक उपभोग विक्रय है। इसका अर्थ यह है कि उत्पाद का क्रय करने वाला पक्ष (उपभोक्ता) कर के भुगतान के लिए उत्तरदायी है न कि उत्पाद का विक्रेता। यदि आप एक कैंडी स्टोर से कैंडी खरीदते हैं तो उस विशिष्ट लेनदेन में आप (एक उपभोक्ता के रूप में) जीएसटी का भुगतान करते हैं। यह सिद्धांत उत्पादन और वितरण के प्रत्येक चरण पर कार्यरत होता है। जब भी कोई लेनदेन किया जाता है, फिर चाहे वह उत्पादन, विरतण या खुदरा स्तर जैसे किसी भी स्तर पर हो, वस्तु या सेवा खरीदने वाले पक्ष को ही जीएसटी का भुगतान करना आवश्यक है। 
    2. बी प्रतिशत उपभोग कर : इसका अर्थ है कि आप जितनी मात्रा में कर भुगतान करते हैं वह आपके द्वारा खरीदी गई वस्तु या सेवा की विक्रय लागत (कर-पूर्व) का एक निश्चित प्रतिशत हिस्सा होता है।
  6. भारत में जीएसटी केंद्रीय उत्पादन शुल्क, अतिरिक्त सीमा शुल्क, केंद्रीय विक्रय कर और सेनवैट जैसे केंद्रीय करों को समाहित करेगा साथ ही यह राज्य विक्रय कर, वैट जैसे राज्य स्तरीय करों और चुंगी, प्रवेश कर इत्यादि जैसे नगरपालिका करों को भी समाहित करेगा। साथ ही जीएसटी के अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष लाभ होंगे।
  7. लंबित मुद्दे -
    1. जीएसटी के अंतर्गत व्यापार के लिए प्रारंभिक सीमा : सेवा कर, केंद्रीय उत्पादन शुल्क और राज्य के वैट के अधिरोपण के लिए विभिन्न राज्यों और केंद्र की भिन्न-भिन्न प्रारंभिक सीमाएं हैं। वर्तमान में जीएसटी के लिए एक समान प्रारंभिक सीमा पर आम राय नहीं बन पाई है।
    2. कर प्रशासन को प्रशिक्षण : जीएसटी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कर नौकरशाही को प्रशिक्षित करना एक विशालकाय कार्य है।
    3. मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी संजाल :केंद्रीय और राज्य करों के संजाल का संयुक्तिकरण करना एक अत्यंत कठिन कार्य है जो जीएसटी की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  8. भारत को अपनी उम्मीदों के संदर्भ में यथार्थवादी होना होगा। ऐसा माना जा रहा है कि जीएसटी मुद्रास्फीति में कमी करेगा जिसके लिए अति सूक्ष्म समझदारी की आवश्यकता है। जबकि जीएसटी करों के प्रपाती प्रभाव को समाप्त करेगा, वहीं सरकार करों की उस निरपेक्ष मात्रा को छोडना पसंद नहीं करेगी जिन्हें संग्रहित करने की वह आदी रही है, जिसने एक राजस्व निष्पक्ष दर की खोज को आवश्यक बना दिया है जो जीएसटी की दरों को उस स्तर तक बढाएगी कि भुगतान किये जाने वाली कर की राशि वही बनी रहे। दीर्घकाल में, जैसे-जैसे कर अनुपालन में सुधार होगा वैसे-वैसे जीएसटी दरों में कमी करने के अवसर उत्पन्न होंगे जो उपभोक्ताओं को राहत पहुंचाने वाली स्थिति होगी। वर्तमान में, सरकार को इस दीर्घ प्रतीक्षित कर सुधार को लाने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि समान कर संग्रहण सुनिश्चित किया जा सके।

वर्ष 2015 की जीएसटी / वैट की वैश्विक स्थिति नीचे दर्शाई गई है।

14.0 अतिरिक्त तकनीकी जानकारी

14.1 संविधान (122 वें संशोधन) विधेयक, 2014 की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

विधेयक की विशिष्ट विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

  1. वस्तु एवं सेवा कर को प्रशासित करने वाले कानून बनाने की शक्ति संसद और राज्यों की विधानसभाओं को एकसाथ प्रदान करना
  2. केंद्रीय उत्पादन शुल्क, अतिरिक्त उत्पादन शुल्क, सेवा कर, अतिरिक्त सीमा शुल्क, जिसे आमतौर पर प्रतिकारी शुल्क कहा जाता है, और विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क जैसे विभिन्न केंद्रीय अप्रत्यक्ष करों और प्रशुल्कों को  समाहित करना
  3. राज्य मूल्य संवर्धित कर / विक्रय कर, मनोरंजन कर (उन्हें छोडकर जो स्थानीय निकायों द्वारा अधिरोपित किये जाते हैं), केंद्रीय विक्रय कर (जिसका अधिरोपण केंद्र द्वारा किया जाता है और संग्रहण राज्य द्वारा किया जाता है), चुंगी कर और प्रवेश कर, क्रय कर, विलासिता कर, और लॉटरी, शर्त और जुए पर लगाए जाने वाले राज्य के करों को समाहित करना।
  4. संविधान के अंतर्गत "विशेष महत्त्व की घोषित वस्तुओं" की संकल्पना का त्याग करना
  5. वस्तुओं और सेवाओं के अंतर-राज्य लेनदेनों पर एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर का अधिरोपण
  6. मानव उपभोग के लिए मद्य, पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पादों को छोडकर सभी वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी अधिरोपित करना। उपरोक्त पदार्थों पर जीएसटी के अधिरोपण का विचार वस्तु एवं सेवा कर परिषद् की सिफारिशों के अनुसार बाद की किसी तिथि को किया जाएगा
  7. अगले पांच वर्षों तक वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप राज्यों को होने वाली किसी भी प्रकार की राजस्व की क्षति के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करना
  8. वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित मुद्दों के परीक्षण के लिए वस्तु एवं सेवा कर परिषद् का निर्माण करना   केंद्र और राज्यों को समाहित होने वाले करों की दरों, करों, उपकरों और अधिभारों, छूट प्राप्त वस्तुओं की सूची और प्रारंभिक सीमा और आदर्श जीएसटी कानूनों इत्यादि  जैसे मानदंडों पर सिफारिशें करना। जीएसटी परिषद् केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता के अधीन कार्य करेगी और सभी राज्य सरकारें इसकी सदस्य होंगी।

14.2 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित पंजीकरण प्रक्रिया की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित पंजीकरण प्रक्रिया की प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

  1. 1. विद्यमान व्यापारी : विद्यमान वैट / केंद्रीय उत्पादन शुल्क / सेवा कर प्रदाताओं को जीएसटी के तहत पुनः पंजीकरण के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं है।
  2. 2. नए व्यापारी :  जीएसटी के तहत पंजीकरण के लिए एकल आवेदन ऑनलाइन प्रस्तुत करना होगा।
  3. 3. पंजीकरण क्रमांक पैन आधारित होगा और यह केंद्र और राज्य दोनों के लिए काम करेगा।
  4. 4. दोनों कर प्राधिकारियों के लिए एकीकृत आवेदन।
  5. 5. प्रत्येक व्यापारी को विशिष्ट पहचान पत्र (आईडी) जीएसटीएन
  6. 6. तीन दिन के अंदर मान्यता मंजूरी
  7. पंजीकरण पश्चात का सत्यापन केवल जोखिम आधारित मामलों में ही।

14.3 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित विवरण प्रस्तुति प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित विवरण प्रस्तुति प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

  1. एक ही विवरण प्रस्तुति केंद्र सरकार और राज्य सरकार, दोनों के प्रयोजनों को संतुष्ट करेगी।
  2. जीएसटी व्यापार प्रक्रियाओं के अंतर्गत विवरण प्रस्तुतीकरण के लिए आठ प्रकार के प्रपत्रों का प्रावधान किया गया है। अधिकांश औसत करदाता अपने विवरण प्रस्तुत करने के लिए केवल चार प्रपत्रों का उपयोग करेंगे। ये हैं आपूर्तियों के लिए विवरण, खरीद के लिए विवरण, मासिक विवरण और वार्षिक विवरण।
  3. छोटे करदाता : जिन छोटे करदाताओं ने संयोजन योजना के विकल्प को चुना है उन्हें त्रैमासिक आधार पर विवरण प्रस्तुत करना है।
  4. विवरणों का प्रस्तुतीकरण पूर्णतः ऑनलाइन होगा। सभी करों का भुगतान भी ऑनलाइन किया जा सकता है।

14.4 जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित भुगतान प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

जीएसटी के अंतर्गत प्रस्तावित भुगतान प्रक्रियाओं की प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

  1. इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रक्रिया - किसी भी चरण पर कागजों का निर्माण नहीं होगा
  2. चालान निरंकान के लिए एकल बिंदु अंतराफलक - जीएसटीएन
  3. भुगतान की सहजता - भुगतान ऑनलाइन बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड / डेबिट कार्ड, एनईएफटी / आरटीजीएस के माध्यम से और चेक / या बैंक में नकद के माध्यम से किया जा सकता है
  4. स्वचालित जनसंख्या विशेषताओं के साथ एकसमान चालान प्रपत्र
  5. एकल चालान और एकल भुगतान उपकरण का उपयोग
  6. प्राधिकृत बैंकों का एकसमान समुच्चय
  7. एकसमान लेखांकन कूट

15.0 एक फिसलन भरी राह

राष्ट्रपति द्वारा सितंबर २०१६ में अनुमति मिलने के बाद जीएसटी का आगे का रास्ता

भारत सरकार ने अंततः सभी राजनीतिक दलों को क्रांतिकारी जीएसटी विधेयक को राज्यसभा के माध्यम से पारित करने की अनुमति देने के लिए राजी कर ही लिया जिसे अंततः लोकसभा में भी पारित किया गया (राज्यसभा द्वारा सुझाए गए संशोधनों को)। राष्ट्रपति ने भी इसे अपना अनुमोदन प्रदान कर दिया है और यह कानून बन गया है।

चूंकि अनेक मुद्दों को पहले ही सैद्धांतिक रूप से सुलझा लिया गया था, अतः अब इसके वास्तविक क्रियान्वयन की चुनौती है। इसकी शीर्ष 5 चुनौतियाँ निम्नानुसार होंगी।

सबसे पहले, जीएसटी परिषद् (अनुच्छेद 279 ए के अनुसार एक संवैधानिक निकाय) को कार्यरत किया जाना आवश्यक है। यह जीएसटी के सफल क्रियान्वयन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, साथ ही एक राष्ट्रीय बाजार का निर्माण और अनवरत त्वरित वृद्धि भी महत्वपूर्ण होंगे। जीएसटी के मुद्दों को अब तक संयोजित करने वाली राज्यों के वित्तमंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की तुलना में जीएसटी परिषद् संरचना और जिम्मेदारियों की दृष्टि से एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। तेजी से चलने के लिए 33 सदस्यीय जीएसटी परिषद् को अब संभवतः एक समिति व्यवस्था (संसद की तरह) को अपनाने की आवश्यकता होगी।

दूसरा, इसे पारदर्शी, उम्मीद के मुताबिक और निरंतर रूप से संचालित किया जाना आवश्यक है ताकि यह अपने सदस्यों और - विनिर्माताओं, व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं से लेकर उपभोक्ताओं, नागरिक समाज, शिक्षाविदों और समग्र रूप से संपूर्ण राष्ट्र जैसे अपने सभी हितधारकों के सम्मान की पात्र बनी रहे। छूट प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं की सिफारिश के माध्यम से, कराधान के लिए प्रारंभिक सीमा निर्धारित करने , राजस्व-तटस्थ दर निर्धारित करने और दर संरचना निर्धारित करने के लिए इसे कर आधार का निर्धारण करने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं का निर्माण करना है। ये अत्यंत गहरे मुद्दे हैं और इनका प्रभाव केंद्र और सभी राज्यों पर पडने वाला है।

तीसरा, क्षतिपूर्ति सूत्र सही बनाकर और प्रत्यायोजित विधि निर्माण के न्यूनीकरण के जरिये परिषद् को इसके सभी सदस्यों के बीच प्रलोभनों के अभिसरण को सुनिश्चित करना होगा। इसके पश्चात ही संसद राज्य सरकारों की राजस्व हानि के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करने के लिए कानून बनाएगी। सभी राज्य चाहेंगे कि उन्हें पहले पांच वर्षों के दौरान होने वाली राजस्व हानि की 100 प्रतिशत क्षतिपूर्ति प्राप्त हो परंतु ऐसा करना असंभव होगा। ऐसी स्थिति में राज्य इस संपूर्ण अवधि के दौरान जीएसटी के तहत राजस्व संग्रहण करने के प्रति उदासीन होंगे। अतः जीएसटी की सफलता की सभी राज्यों की इच्छा को सुनिश्चित करने के लिए एक शिथिल क्षतिपूर्ति सूत्र की आवश्यकता होगी (ठीक  उसी प्रकार जैसे वर्ष 2005 में वैट के संबंध में किया गया था) : पहले वर्ष के दौरान 100 प्रतिशत, दुसरे वर्ष 75 प्रतिशत, उर इस प्रकार धीरे-धीरे कम करते हुए अंतिम वर्ष में इसे 25 प्रतिशत तक नीचे लाना होगा।

चौथा, अनुच्छेद 269 ए यह अधिदेश देता है कि (ए) प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए विशेष दरों के प्रावधान, (बी) उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए विशेष प्रावधान करने और (सी) उस तिथि का निधारण करने के लिए जब से पेट्रोलियम उत्पाद जीएसटी की परिधि में आएंगे,  के लिए सिफारिशें की जानी हैं। अनिश्चितता से बचने के लिए परिषद् को यह इंगित करना होगा कि वह इन मुद्दों को किस प्रकार संबोधित करेगी। उदाहरणार्थ, वह यह प्रारंभ में ही सिफारिश कर सकती है (या कम से कम विचार तो कर सकती है) कि वह किस वर्ष से पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाएगी। इस नई व्यवस्था को सही ढंग से स्थापित होने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करने के लिए, वह इस बात का भी परीक्षण कर सकती है कि कितने समय बाद या किन परिस्थितियों में वह जीएसटी दरों पर की गई सिफारिशों की समीक्षा करेगी। जीएसटी को 1 अप्रैल 2017 से लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चूंकि परिषद् को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियां प्रदान की गई हैं (क्योंकि वह जीएसटी कानून की सिफारिश करेगी, देश में जीएसटी के क्रियान्वयन का निरीक्षण करेगी और विवादों के निराकरण के लिए निर्णयादेश तंत्र का गठन करेगी) अतः उसे अपनी शक्तियों का उपयोग अत्यंत समावेशकता के साथ करना होगा। उसे मसौदा सलाहकार दस्तावेज जनता के सूक्ष्म परीक्षण  के लिए रखने होंगे, मुद्दों पर सभी के विचार शामिल करने होंगे और सभी के लिए एक संवाद योग्य पोर्टल स्थापित करना होगा।

पांचवा, केंद्रीय जीएसटी, अंतर-राज्य जीएसटी और जीएसटी कानूनों, राजस्व तटस्थ दर और दर संरचना  की संरचना और विषय सामग्री के बारे में निर्णय करना होगा। जबकि केंद्रीय जीएसटी के लिए राजस्व-तटस्थ दर निर्धारित करना आसान होगा, परंतु प्रत्येक राज्य के लिए व्यक्तिगत रूप से इसका निर्धारण करना कठिन है। प्रत्येक राज्य के लिए सेवा कर के हिस्से के अनुमान लगाने में कठिनाइयां हैं, क्योंकि राज्यवार सेवा कर संग्रह के आंकडे उपलब्ध नहीं हैं। राज्यों की अप्रत्यक्ष कर राजस्व पर अत्यधिक (चरम) निर्भरता को देखते हुए इसमें सावधानी बरतना आवश्यक होगा। जब राजस्व-तटस्थ दर को संपूर्ण कर आधार पर लागू किया जाता है तो यह वर्तमान राजस्व का निर्माण करती है। राज्य सरकारें संभवतः बजट तटस्थ दर को देखना चाहेंगी, वह दर, जिसपर, उनके कम व्यय को देखते हुए, उनके व्यय बजट तटस्थ रहते हैं। यह राजस्व तटस्थ दर से कम होगी, अतः राज्य (और केंद्र) सरकारों को एक सुरक्षा की गुंजाईश प्रदान करेगी। तेरहवें वित्त आयोग ने एक व्यापक आधार पर और बहुत कम  छूटों के साथ 12 प्रतिशत राजस्व तटस्थ दर की सिफारिश की थी। अरविंद सुब्रमण्यम पैनल ने 15 प्रतिशत की सिफारिश की थी। राजस्व तटस्थ दर को 12 से 15 प्रतिशत के बीच रखना वांछनीय होगा।

अभी तक भारत की संघीय राजकोषीय संरचना काफी सुचारू रही है क्योंकि संविधान ने केंद्र और राज्यों को परस्पर अनन्य कर आधार प्रदान किये थे। जीएसटी इन दोनों पक्षों के बीच  की उस दीवार को तोडेगा। अब वे एक समान अप्रत्यक्ष कर आधार साझा करेंगे और परिषद् ऐसा करने की पद्धतियां प्रदान करेगी। यह सामंजस्यपूर्ण और धारणीय दोनों होना चाहिए।

पीआईबी की आधिकारिक विज्ञप्ति यहाँ पढी जा सकती है - (http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=148240)


Disclaimer : Images taken from the internet and may belong to respective owners (publishers and research houses etc.). All copyrights acknowledged.
Other Useful Pages


Excellent learning sessions from PT
Excellent learning sessions from PT
(View, Learn, Grow - for any query, call 0-97555-99515)


Winning the World Multiple Career Options
After XII
Vocabulary Development |
For Everyone - by Sandeep
Manudhane sir
UPSC Civil Services
Prelims - Paper I (GS)
2016 - detailed analysis
Universe and the Solar
System - PT's IAS
Academy - Sample
lecture 2
PT Education ● 23 years ● 5,00,000 happy students ● 50 cities ● Legacy of success!